Opinion: पूजा पाल के सवालों पर मचा बवाल, ट्रोलिंग के बीच सपा पर उठे नए सवाल

Written By: Rishabh Kumar Updated by: Rishabh Kumar
Updated Date:July 18, 2026 6:57 PM IST

Opinion: पूजा पाल के सवालों पर अखिलेश यादव की ट्रोल आर्मी के हमले ने समाजवादी पार्टी की गैर-यादव ओबीसी राजनीति की बड़ी कमी को उजागर कर दिया है.

डॉ. दीपक कुमार पाण्डेय: भारतीय लोकतंत्र में विपक्षी दल से तीखे सवाल पूछना न केवल अधिकार है, बल्कि स्वस्थ परंपरा भी है. हाल ही में भाजपा की उत्तर प्रदेश उपाध्यक्ष पूजा पाल ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) पर अत्याचार तथा अपराधियों को संरक्षण देने के मुद्दे पर सीधे सवाल पूछे. पूजा पाल सत्ताधारी दल से जुड़ी पदाधिकारी हैं, जबकि अखिलेश यादव मुख्य विपक्षी दल का नेतृत्व करते हैं.

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पूजा पाल के सवालों का महत्व और भी अधिक है क्योंकि उनका व्यक्तिगत दर्द सपा शासनकाल से जुड़ा है. उनके पति राजू पाल की हत्या सपा शासन के दौरान हुई थी. ऐसे में उनके सवाल न केवल राजनीतिक आलोचना हैं, बल्कि एक पीड़ित परिवार से भी जुड़े हैं. लोकतंत्र में ऐसे सवालों का जवाब राजनीतिक बहस, तथ्यों और जवाबदेही से आना चाहिए. लेकिन अखिलेश यादव की ओर से कोई सीधा, तर्कसंगत जवाब सामने नहीं आया. इसके स्थान पर सपा समर्थकों की ट्रोल आर्मी ने पूजा पाल के खिलाफ अपशब्दों, गालियों और अपमानजनक टिप्पणियों की बौछार कर दी.

एक गैर-यादव ओबीसी महिला नेता को इस तरह निशाना बनाना महज एक घटना नहीं है. यह समाजवादी पार्टी की गहरी फॉल्ट लाइन को उजागर करता है.

समाजवादी पार्टी की स्थापना पिछड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के नारे के साथ हुई थी. मुलायम सिंह यादव ने इसे एक व्यापक पिछड़ा-दलित-मुस्लिम गठजोड़ के रूप में पेश किया. लेकिन धीरे-धीरे पार्टी का चरित्र बदलता गया. नेतृत्व, संगठन, टिकट वितरण और सत्ता के गलियारों में यादव समुदाय का प्रभुत्व बढ़ता चला गया. गैर-यादव ओबीसी समुदाय-कुर्मी, लोध, मौर्य, कोइरी, मल्लाह, निषाद, बघेल, पटेल आदि-को पर्याप्त जगह नहीं मिली. जब कभी इन समुदायों के नेता या कार्यकर्ता सपा की आलोचना करते या सवाल उठाते, तो उन्हें “बाहरी” या “विरोधी” मान लिया जाता.

पूजा पाल का मामला इसी मानसिकता का जीवंत उदाहरण है. वे एक ओबीसी महिला हैं जिन्होंने व्यक्तिगत त्रासदी के बाद राजनीति में कदम रखा. जब उन्होंने गैर-यादव ओबीसी के मुद्दे उठाए, तो जवाब राजनीतिक नहीं, व्यक्तिगत हमला बन गया. यह दर्शाता है कि सपा के भीतर आलोचना को बर्दाश्त करने की संस्कृति कमजोर है, खासकर जब आलोचक गैर-यादव ओबीसी पृष्ठभूमि से आता हो.

अखिलेश यादव ने पार्टी को आधुनिक और समावेशी दिखाने की कोशिश की है. उन्होंने पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूला अपनाया, युवा छवि पेश की, सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ाया और गैर-यादव ओबीसी तथा दलित वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति बनाई. सैद्धांतिक रूप से यह सही दिशा थी. यूपी में यादव आबादी करीब 8-10 प्रतिशत है, जबकि अन्य ओबीसी समुदाय ओबीसी वोट का बड़ा हिस्सा रखते हैं. दलित और मुस्लिम वोटर भी महत्वपूर्ण हैं. पीडीए के जरिए इन सबको जोड़ने की बात तर्कसंगत लगती है.

लेकिन असल समस्या यह है कि अखिलेश यादव पार्टी के अंदरूनी स्वभाव और समर्थक वर्ग के व्यवहार को बदलने में सफल नहीं हो पाए. ट्रोल आर्मी अभी भी वही भाषा और रवैया अपनाती है जो दशकों पुराना है. जब कोई गैर-यादव ओबीसी नेता सवाल उठाता है, तो उसे जातिवादी गालियों से जवाब दिया जाता है. महिला नेताओं के मामले में यह और भी घिनौना रूप ले लेता है. पूजा पाल के साथ जो हुआ, वह कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा है.

इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ता है. गैर-यादव ओबीसी समुदाय जब देखते हैं कि उनकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता और उनकी महिला नेताओं को अपमानित किया जाता है, तो वे सपा से भावनात्मक और राजनीतिक रूप से दूर हो जाते हैं. दलित समुदाय भी इसी तरह कई बार सपा से छिटकता रहा है. परिणामस्वरूप पार्टी का विस्तार सीमित रहता है. 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा को इसी वजह से व्यापक समर्थन नहीं मिल सका.

अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है. पार्टी की कोर संस्कृति और ऑनलाइन समर्थक वर्ग पर उनका नियंत्रण कमजोर दिखता है. अगर वे वाकई पीडीए को सफल बनाना चाहते हैं, तो केवल बयान काफी नहीं. उन्हें पार्टी के अंदर गैर-यादव ओबीसी नेताओं को वास्तविक सम्मान और जगह देनी होगी. ट्रोलिंग को खुलकर रोकना होगा. आलोचना का जवाब तथ्यों, तर्कों और नीतियों से देना होगा.

जब तक यह परिवर्तन नहीं होता, सपा की यादववादी फॉल्ट लाइन सक्रिय रहेगी. यह फॉल्ट लाइन न केवल गैर-यादव ओबीसी को दूर भगाती है, बल्कि पार्टी को एक सीमित जातिगत पहचान में कैद रखती है. यूपी जैसी विविधतापूर्ण राजनीति में एक जाति की पार्टी लंबे समय तक सफल नहीं हो सकती. पूजा पाल जैसे नेताओं के सवाल इसी सच्चाई को बार-बार सामने ला रहे हैं.

(लेखक पंजाब सेंट्रल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

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