Opinion: गविष्ठि यात्रा में गोहत्या की बातें और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध, आखिर अविमुक्तेश्वरानंद कहना क्या चाहते हैं?
ऋत्विक जायसवाल : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गविष्ठि यात्रा में ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं जिससे लगता है कि वह भक्तों को सेलेक्टिव राजनीतिक दिशा की ओर भी मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयान विपक्षी दलों के एजेंडे से पूरी तरह मेल खाते हैं. (photo credit, IANS)
ऋत्विक जायसवाल : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गविष्ठि यात्रा में गोहत्या के बहाने अब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करने लगे हैं. इसके बाद सवाल उठ रहे हैं कि वह आखिर किस नैरेटिव को सेट करने की कोशिश में हैं. यात्रा के दौरान वह अपने प्रवचनों के जरिए न केवल सरासर झूठ बोल रहे हैं बल्कि अपने भक्तों को सेलेक्टिव राजनीतिक दिशा की ओर भी मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं. वे जम्मू-कश्मीर में पुराने रणबीर पीनल कोड का हवाला देकर जनता को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उन्हें पता है कि उत्तर प्रदेश का गोवध निवारण अधिनियम 2020 (संशोधित) पूरे देश का सबसे कठोर, व्यावहारिक और प्रभावी कानून है.
असल में रणबीर पीनल कोड 19वीं सदी का एक पुराना कानून था, जिसमें गोहत्या पर प्रतिबंध तो था, किन्तु इसे अमल में लाने के लिए प्रभावी मशीनरी न के बराबर प्रभावी थी. मगर सवाल ये उठता है कि अविमुक्तेश्वरानंद को कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया जाना ज्यादा आपत्तिजनक क्यों लगने लगा है. क्या इसके पीछे कोई छिपी हुई मंशा है. यहां आश्चर्य की बात यह है कि गोवध निवारण को लेकर यूपी की योगी सरकार की ओर से बनाये गये देश के सबसे कठोर कानून की ओर से अविमुक्तेश्वरानंद पूरी तरह से आंखे क्यों मूंदे हुए हैं. वह गोवध निवारण कानून पर यूपी मॉडल की कोई चर्चा नहीं करते. सिर्फ इसलिए क्योंकि यहां यूपी में गोरक्षनाथ पीठ के उस महंत के हाथों में सत्ता की बागडोर है और जिसे अविमुक्तेश्वरानंद फूटी आंख पसंद नहीं करते हैं.
क्या है 2020 अधिनियम?
योगी आदित्यनाथ सरकार का 2020 अधिनियम गोहत्या को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध बनाता है. इसमें 3 से 10 वर्ष तक की कैद और 50 हजार से 5 लाख रुपये तक जुर्माना है. अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, हाफ एनकाउंटर और एनएसए जैसे एक्शन से गोतस्करों की कमर यूपी में टूट चुकी है. अपने पहले ही आदेश से यूपी के अवैध स्लॉटरहाउस बंद करने, गोमांस परिवहन पर सख्ती, पुलिस को बिना वारंट छापेमारी का अधिकार और गौशालाओं का विस्तार, यह भारत में अबतक का सबसे कठोर गोवध निवारण कानून है. फिर सवाल उठता है कि यह कानून अविमुक्तेश्वरानंद को क्यों नहीं भाता? इस बात का उत्तर जनता बखूबी जानती है.
अविमुक्तेश्वरानंद इन दिनों एक और सर्टिफिकेट बांट रहे हैं. वह मुगलों और मुस्लिमों को 'गोभक्त' बताते हुए यह भी कह रहे हैं कि वे गोमांस नहीं खाते. जबकि हकीकत इससे पूरी तरह उलट है. अगर आज जम्मू-कश्मीर में गोवध निवारण पर कोई ठोस कानून नहीं है तो उन्हें यूपी जैसा सख्त कानून बनाने की मांग करनी चाहिए थी, मगर वह चाहते हैं कि कश्मीर में दोबारा अनुच्छेद 370 लागू हो जाएय इसके पीछे उनकी मंशा क्या है यह वही ठीक-ठीक समझा सकते हैं. मगर सवाल उठता है कि अगर जम्मू-कश्मीर में गोवध निवारण के कानून प्रभावी नहीं हैं तो भी वहां गोमाता का कत्ल कौन कर रहा है? क्या हिंदू यह कार्य कर रहे हैं? अविमुक्तेश्वरानंद यहां पर चुप्पी साध लेत हैं.
सत्य यह है कि लगातार विपक्ष की आवाज बनने की कोशिश के कारण अविमुक्तेश्वरानंद अब अपनी स्वीकार्यता को समाप्त कर रहे हैं. वह खुद कहते सुने जा सकते हैं कि सोशल मीडिया पर लोग उन्हें गालियां बक रहे, उन्हें नकली शंकराचार्य बता रहे. असलियत भी यही है कि अपने अनर्गल आरोप, आधे-अधूरे तथ्य और चयनात्मक आलोचना से उनकी विश्वसनीयता तेजी से खिसक रही है. क्या अब उन्हें आत्मचिंतन नहीं करना चाहिए? योगी सरकार और गौ रक्षा जैसे मुद्दों पर बिना सबूत आरोप लगाते रहने से वे हिंदू समाज में अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं.
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि उनके बयान विपक्षी दलों (खासकर सपा) के एजेंडे से पूरी तरह मेल खाते हैं. आम जनमानस ये पूछने लगा है कि क्या अविमुक्तेश्वरानंद अब पूरी तरह से विपक्ष के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं? स्वयं को देश का सर्वोच्च संत बताने का दावा करने वाले अविमुक्तेश्वरानंद का कर्तव्य बनता है कि वह सनातन समाज का सम्यक मार्गदर्शन करें, ना कि किसी राजनीतिक दल के प्रवक्ता की तरह किसी दूसरे दल के खिलाफ जुबानी हमले करें. अगर वह रणबीर पीनल कोड की सराहना करते हैं तो उन्हें यूपी के गोवध निवारण अधिनियम 2020 का भी खुला समर्थन करते हुए पूरे देश की राज्य सरकारों से इसे अपने अपने यहां लागू कराने की मांग करनी चाहिए. कानून के क्रियान्वयन में अगर कहीं कोई चूक है तो उसे उजागर करते हुए सत्ता अधिष्ठान को अपनी सलाह भी देनी चाहिए. स्पष्ट शब्दों में उन्हें विपक्ष के हाथों की कठपुतली बनकर और राजनीति द्वेष से कार्य करते हुए अपने भक्तों को अधूरा सच सुनाने से बचना चाहिए.
(ऋत्विक जायसवाल सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर शोध और लेखन का कार्य करते हैं. अखिल भारतीय जायसवाल सर्ववर्गीय युवा महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं.)
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