PDA पर क्यों भड़के ओमप्रकाश राजभर? अखिलेश यादव की राजनीति पर उठाए बड़े सवाल
ओमप्रकाश राजभर लगातार अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की PDA रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं. जानिए सैफई मॉडल, OBC प्रतिनिधित्व, परिवारवाद और यूपी चुनाव 2027 की पूरी राजनीतिक कहानी.
विपक्ष लंबे समय से सपा पर सैफई केंद्रित विकास का आरोप लगाता रहा है.
डॉ. संत प्रकाश तिवारी, लेखक: यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल धीरे-धीरे गर्म होने लगा है. मुकाबला मुख्य तौर पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच माना जा रहा है. एक तरफ अखिलेश यादव PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा देकर नया सामाजिक समीकरण तैयार करने में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी अपने कामकाज और संगठन के दम पर चुनावी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है. लेकिन इसी बीच यूपी सरकार के मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर लगातार अखिलेश यादव की PDA राजनीति पर हमला बोल रहे हैं. राजभर का कहना है कि PDA सिर्फ एक राजनीतिक नारा है, जबकि असल फायदा सीमित जातीय दायरे तक ही पहुंचता है. उन्होंने हाल ही में सोशल मीडिया पर यहां तक लिख दिया कि PDA का मतलब पहला दावा अहिर है. यही वजह है कि अब यह बहस सिर्फ चुनावी बयानबाजी नहीं, बल्कि यूपी की जातीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है.
सैफई मॉडल को लेकर क्यों उठते हैं सवाल?
ओमप्रकाश राजभर अक्सर आरोप लगाते हैं कि जब भी समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो विकास का केंद्र सैफई, मैनपुरी और इटावा बेल्ट बन जाता है. विपक्ष लंबे समय से सपा पर सैफई केंद्रित विकास का आरोप लगाता रहा है. सपा शासन के दौरान यह चर्चा आम थी कि सैफई में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और दूसरी सुविधाएं प्रदेश के बाकी हिस्सों की तुलना में ज्यादा बेहतर थीं. इसी दौरान सैफई महोत्सव भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना. फिल्मी सितारों और बड़े कार्यक्रमों से सजे इस आयोजन पर विपक्ष ने सवाल उठाए कि जब प्रदेश कानून-व्यवस्था और दंगों जैसी समस्याओं से जूझ रहा था, तब सरकार उत्सव और शक्ति प्रदर्शन में व्यस्त क्यों थी. खासतौर पर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान सैफई महोत्सव को लेकर विपक्ष ने सपा सरकार को जमकर घेरा था. राजभर अब उसी पुराने मुद्दे को फिर से उठाकर गैर-यादव पिछड़ी जातियों के बीच संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं.
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भर्तियों और आयोगों को लेकर क्यों होता है विवाद?
राजभर का दूसरा बड़ा हमला समाजवादी पार्टी की सरकार में हुई भर्तियों और नियुक्तियों को लेकर है. उनका आरोप है कि उस समय सरकारी नौकरियों और आयोगों में एक खास जाति और क्षेत्र को ज्यादा महत्व दिया गया. सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग यानी UPPSC को लेकर होती रही है. अखिलेश सरकार में आयोग के अध्यक्ष रहे अनिल यादव के समय कई भर्ती प्रक्रियाओं पर सवाल उठे थे. पुलिस भर्ती से लेकर प्रशासनिक चयन तक विपक्ष लगातार पक्षपात के आरोप लगाता रहा. राजभर बार-बार पूछते हैं कि सपा बताए कि उसके शासनकाल में राजभर, निषाद, बिंद, मल्लाह, कश्यप, मौर्य, कुशवाहा, सैनी, पाल और प्रजापति जैसी गैर-यादव OBC जातियों को कितना प्रतिनिधित्व मिला. इसी मुद्दे को आधार बनाकर बीजेपी और उसके सहयोगी दल गैर-यादव पिछड़ों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
परिवारवाद और राजनीतिक हिस्सेदारी पर हमला
ओमप्रकाश राजभर सिर्फ जातीय प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि परिवारवाद के मुद्दे पर भी समाजवादी पार्टी को घेरते हैं. उनका कहना है कि सपा में बड़े राजनीतिक फैसले और सुरक्षित सीटें लंबे समय तक यादव परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रहीं. एक समय ऐसा था जब मुलायम सिंह यादव परिवार के कई सदस्य सक्रिय राजनीति में थे और मैनपुरी, कन्नौज, बदायूं, फिरोजाबाद और आजमगढ़ जैसी सीटों पर परिवार का प्रभाव दिखाई देता था. राजभर सवाल उठाते हैं कि अगर राजनीति सामाजिक न्याय और 'जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के सिद्धांत पर चलती है, तो फिर गैर-यादव पिछड़ी जातियों को शीर्ष नेतृत्व में उतनी जगह क्यों नहीं मिलती. यही सवाल अब धीरे-धीरे चुनावी बहस का हिस्सा बनता जा रहा है.
मुस्लिम प्रतिनिधित्व और PDA की असली चुनौती
यह बहस सिर्फ गैर-यादव OBC तक सीमित नहीं है. मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. कई विरोधी दल आरोप लगाते हैं कि समाजवादी पार्टी ने लंबे समय तक मुस्लिम वोट बैंक का इस्तेमाल किया, लेकिन नेतृत्व में उतनी भागीदारी नहीं दी. इसी मुद्दे पर असदुद्दीन ओवैसी भी PDA राजनीति पर सवाल उठा चुके हैं. उनका तर्क है कि अगर आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी की बात होती है, तो फिर मुस्लिम समाज को शीर्ष नेतृत्व में उतनी जगह क्यों नहीं मिलती. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राजभर दरअसल उसी पुराने सवाल को फिर से सामने ला रहे हैं कि क्या PDA की राजनीति में गैर-यादव पिछड़ों, छोटी OBC जातियों और दूसरे सामाजिक समूहों को वास्तव में बराबर हिस्सेदारी मिलती है या नहीं. यही सवाल आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है.
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