नई दिल्ली: ईद के बाद कश्मीर घाटी में आतंकियों के खिलाफ सेना ने फिर से अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है. रमजान के बाद सेना को मिली कार्रवाई की छूट से घाटी की राजनीतिक पार्टियों के नाराज होने की खबरों के बीच बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के अपने नेताओं की दिल्ली में एक बैठक बुलाई है. ऐसा माना जा रहा है कि इस बैठक में घाटी के हालात पर चर्चा होगी.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जम्मू कश्मीर सरकार में शामिल भाजपा के सभी मंत्रियों और कुछ शीर्ष नेताओं को अत्यावश्यक बैठक के लिए आज नई दिल्ली बुलाया है. जम्मू कश्मीर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘‘बैठक के लिए भाजपा के सभी मंत्रियों को नई दिल्ली बुलाया गया है.’’ प्रदेश भाजपा प्रमुख रवींदर रैना और पार्टी महासचिव (संगठन) आशो कौल को भी बैठक के लिए बुलाया गया है. हालांकि, भाजपा के वरिष्ठ नेता ने बैठक की वजह के बारे में नहीं बताया.

फैसले से पीडीपी भी नाराज
जम्मू-कश्मीर में रमजान के महीने में आतंकवादियों के खिलाफ अभियान चलाने पर लगाई गई रोक केंद्र सरकार द्वारा हटा लिए जाने पर राज्य की राजनीतिक पार्टियों ने निराशा जताई और संघर्षविराम को प्रभावकारी नहीं बना पाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराया. सत्ताधारी पीडीपी ने कहा कि पार्टी को इस फैसले से निराशा तो है लेकिन वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकती क्योंकि शांति कायम रखना दोनों तरफ की जिम्मेदारी है.

पीडीपी महासचिव पीरजादा मंसूर ने कहा, ‘‘शांति बनाए रखना दोनों तरफ की जिम्मेदारी है. यह एकतरफा चीज नहीं है. हमने अपनी तरफ से सब कुछ करने की कोशिश की. क्या कोई ऐसा विश्वास बहाली उपाय है जिस पर हमने या महबूबा ने काम नहीं किया? पत्थरबाजों को माफी दी गई, उन पर दर्ज हजारों मुकदमे वापस लिए गए, यहां तक कि उनके मुकदमे भी वापस ले लिए गए जिन पर तत्कालीन नेशनल कांफ्रेंस सरकार ने 2010 में मुकदमे दर्ज किए थे.’’

मंसूर ने कहा, ‘‘वार्ता प्रक्रिया भी अपनाई गई, केंद्रीय गृह मंत्री ने हुर्रियत का नाम लेकर उनसे बातचीत के बारे में जिक्र किया. हम और क्या कर सकते थे?’’ उन्होंने कहा कि घाटी के हालात ने पीडीपी के पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा है. लेकिन पार्टी नाउम्मीद नहीं हुई है.

विपक्षी दल भी नाराज
राज्य में मुख्य विपक्षी नेशनल कांफ्रेंस के प्रवक्ता जुनैद मट्टू ने कहा, ‘‘यह निराशाजनक है लेकिन ऐसा नहीं है कि यह पूरी तरह अप्रत्याशित फैसला हो.’’ मट्टू ने कहा कि केंद्र सरकार को परोक्ष रूप से कुछ ऐसे कदम उठाने चाहिए थे जिससे संघर्षविराम प्रभावकारी हो पाता. कांग्रेस की जम्मू – कश्मीर इकाई के अध्यक्ष जी ए मीर ने कहा कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के पास कश्मीर को लेकर कोई स्पष्ट नीति या रूपरेखा नहीं है.

उन्होंने कहा कि राज्य की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने रमजान के महीने में कश्मीर में संघर्षविराम की वकालत की थी लेकिन केंद्र ने इसे वापस लेने का फैसला एकतरफा तरीके से किया.

रमजान के महीने में जम्मू-कश्मीर में सीजफायर (युद्धविराम) लगाने के सरकार के फैसले का कुछ खास फायदा नहीं हुआ था. ऐसे में सरकार ने ईद खत्म होते ही घाटी में फिर से सेना को आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने की छूट दे दी है.