पिथौरागढ: उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में सीमावर्ती गांवों के आदिवासियों को राशन का पूरा कोटा नहीं मिल पाने के कारण उन्हें नेपाली बाजार से मिलने वाले चीनी अनाज पर निर्भर रहना पड़ता है. क्षेत्र में राशन की आपूर्ति बढ़ाने की मांग को लेकर आज यहां धारचूला के उपजिलाधिकारी आर के पांडे से मिलने आये व्यास घाटी के प्रतिनिधिमंडल के एक आदिवासी नेता कृष्णा गर्ब्याल ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे राशन का कोटा उनकी जरूरत से कम पड़ रहा है. इस कारण ग्रामीणों को नेपाली बाजार में बिकने वाले चीनी अनाज पर निर्भर रहना पड़ता है. Also Read - Covid-19 New Cases: देश में करीब 10 हजार नए केस आए, एक्‍ट‍िव मरीज लगभग 2 लाख

उन्होंने कहा कि ग्रामीण गर्बियांग के पास भारत और नेपाल को जोड़ने वाले काली नदी पर बने पुल को पार करते हैं और अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए पड़ोसी देश के टिंकर और चांगरू गांवों के बाजार से राशन खरीदते हैं. गर्बयाल ने बताया कि सरकार हर परिवार को प्रति माह पांच किलो गेहूं और दो किलो चावल देती है जो बहुत कम है और इससे भी बड़ी बात यह है कि उन्हें पिछली बार राशन मानसून शुरू होने से पहले मिला था. Also Read - Chinese village in Arunachal! चीन ने तीन महीनों के अंदर अरुणाचल प्रदेश में बसा दिया गांव? भारत ने दिया ये जवाब

हालांकि, इस संबंध में पांडे ने कहा कि मानसून शुरू होने से पहले हेलीकॉप्टर द्वारा व्यास घाटी के ग्रामीणों के लिये राशन भेजा गया था जबकि ऊंचाई पर बसे गांवों के लिये अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर का राशन अभी भेजा जाएगा. उन्होंने कहा कि सड़क मार्ग की मरम्मत जारी रहने के कारण प्रशासन को व्यास घाटी तक राशन पहुंचाने के लिये हेलीकॉप्टर की उपलब्धता पर निर्भर रहना पड़ता है और इसके लिये प्रशासन सेना के संपर्क में भी है, ताकि उनके हेलीकॉप्टरों का प्रयोग किया जा सके. Also Read - COVID-19 vaccination in India: भारत में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू, लगभग दो लाख कोरोना योद्धाओं को दी गई पहली खुराक; बड़ी बातें