
Farha Fatima
फ़रहा फ़ातिमा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस से ग्रेजुएशन के बाद पत्रकारिता करियर की शुरुआत 2015 में LIVE India में इंटर्नशिप से की. प्रारंभिक दौर में ही उन्होंने जामिया ... और पढ़ें
प्रशांत किशोर ने अपनी नई पार्टी जन सुराज को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पूर्ण रूप से उतार दिया है. पार्टी ने 243 में से सभी सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं. राघोपुर से पहले किशोर के खुद लड़ने की अटकलें थीं, लेकिन वहां से चंचल सिंह उम्मीदवार हैं. किशोर स्वयं किसी भी सीट से चुनाव मैदान में उतरने से इनकार कर चुके हैं. उन्होंने 15 अक्टूबर 2025 को पटना में पत्रकारों से बातचीत में स्पष्ट कहा कि यह निर्णय पार्टी के सामूहिक हित में लिया गया है. इसके पीछे की मुख्य वजहों पर एक नजर.
किशोर ने बताया कि जन सुराज के सदस्यों ने फैसला किया है कि उन्हें चुनाव लड़ने के बजाय अन्य उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने और संगठनात्मक कार्यों पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने कहा, “मैं जो काम करता रहा हूं, करता रहूंगा.” यह निर्णय पार्टी को एक व्यक्ति-केंद्रित (person-centric) से अधिक संस्थागत (institutional) बनाने की दिशा में है. किशोर पिछले दो वर्षों से गांव-गांव पदयात्रा कर जनता से जुड़ रहे हैं, और उनका मानना है कि चुनाव लड़ने से उनका ध्यान भटक सकता है.
किशोर ने पार्टी के लिए 150+ सीटों का लक्ष्य रखा है, और कहा है कि 150 से कम सीटें मिलना हार मानी जाएगी. चुनाव न लड़कर वे पूरे अभियान की रणनीति संभाल सकेंगे, जो एक पूर्व चुनाव स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में उनकी ताकत है. इससे पार्टी को एनडीए और महागठबंधन के बीच भ्रम की स्थिति का फायदा मिल सकता है. उदाहरण के लिए, राघोपुर से तेजस्वी यादव के खिलाफ सीधा मुकाबला न लड़कर वे अन्य सीटों पर फोकस कर सकते हैं.
किशोर ने बार-बार कहा है कि वे मुख्यमंत्री बनने या व्यक्तिगत सत्ता की दौड़ में नहीं हैं. उनका जोर “बदलाव की राजनीति” पर है, जहां सत्ता में बैठे लोग “व्यक्तिगत लाभ” के लिए काम कर रहे हैं. चुनाव न लड़ना उनके इस दर्शन को मजबूत करता है कि जन सुराज एक आंदोलन है, न कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा.
कुछ आलोचकों का मानना है कि किशोर को अपनी जीत का पूरा भरोसा नहीं है. पहले वे नीतीश कुमार या तेजस्वी के खिलाफ लड़ने की बात कर रहे थे, लेकिन अब पीछे हट गए. विपक्षी दलों (जैसे RJD) ने इसे “हार मान लेना” बताया है. हालांकि, किशोर ने इसे खारिज किया है.
X पर कई यूजर्स का कहना है कि नेता का मैदान न उतरना “असुरक्षा” दिखाता है, और वोट शेयर 5-7% तक गिर सकता है. लेकिन समर्थक इसे “व्यवस्था परिवर्तन” की रणनीति मानते हैं. यह फैसला किशोर की रणनीतिक सोच को दर्शाता है, लेकिन चुनावी राजनीति में जहां व्यक्तित्व महत्वपूर्ण होता है, यह जोखिम भरा भी हो सकता है. बिहार विधानसभा चुनाव दो चरणों में 6 और 11 नवंबर 2025 को होंगे, परिणाम 14 नवंबर को आएंगे.
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