नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन सप्ताह में तीसरी बार मंगलवार को ओडिशा पहुंचे. आगामी विधानसभा और आम चुनावों के मद्देनजर मोदी का बलांगीर का दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे पहले पीएम ने 24 दिसंबर को भुवनेश्वर और खुर्दा वहीं पांच जनवरी को बारीपदा का दौरा किया था. तीन हिन्दीभाषी राज्यों में हार और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन के बाद बीजेपी अब ईस्ट की ओर देख रही है. आंध्रप्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और वेस्ट बंगाल की 144 सीटों पर बीजेपी की नजर है. 2014 के लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में बीजेपी की स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन हिन्दीभाषी राज्यों में घटते जनाधार के बीच पार्टी अब इन पांच राज्यों पर फोकस कर रही है.

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पूरब के राज्यों में से एक ओडिशा में बीजेपी के पास अच्छा मौका है. बीजेडी पार्टी के नवीन पटनायक पिछले 18 सालों से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन बीजेपी राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए तैयार है. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सिर्फ एक सीट पर जीत हासिल की थी. 20 सीटों पर बीजेपी के हाथों उसे हार का सामना करना पड़ा था.हालांकि पश्चिमी ओडिशा की 9 सीटों पर बीजेपी दूसरे स्थान पर रही थी. 2016 में ओडिशा के लोकल बॉडी इलेक्शन में बीजेपी ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी. पार्टी ने 849 जिला परिषद सीटों में से 297 सीटों पर जीत हासिल की थी.वहीं चेयरपर्सन की 30 में 8 सीटों पर जीत हासिल की थी. इस चुनाव में कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही थी. लोकसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ते ही बीजेपी मशिनरी बदलाव के साथ एक बार फिर एक्शन में आ गई है.

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हालांकि यह महज संयोग नहीं हो सकता है कि स्थानीय बीजेपी कैडर में जान फूंकने के लिए पीएम मोदी ने अपने चौथे कार्यकाल के दौरान प्रमुख संबोधन के लिए कटक को चुना. इसके बाद बीजेपी ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को नवीन पटनायक के सामने बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप घोषित किया. ओडिशा में बीजेपी का फंडा क्लियर है. खुद को प्रमुख विपक्ष के रूप में पेश करो और धीरे-धीरे राज्य में पार्टी का विस्तार करो. ओडिशा में कोई और पार्टी नहीं है जिससे बीजेपी गठबंधन कर सके.

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वहीं ओडिशा में बीजेपी एक और समीकरण पर काम कर रही है. बीजेडी की सीटों को टारगेट करने के साथ ही बीजेपी यह भी जानती है कि अगर भविष्य में जरूरत पड़ी तो बीजेडी एनडीए का हिस्सा बन सकती है. यह एक नाजुक संतुलन है जो बताता है कि भाजपा और बीजेडी जरूरत पड़ने पर साथ आ सकते हैं जैसा कि राज्यसभा में उपसभापति के लिए भाजपा के उम्मीदवार का समर्थन करने का निर्णय. बीजेडी पहले एनडीए का हिस्सा रहा चुका है. भाजपा के भीतर कुछ लोग आशावादी हैं कि वे पुराने विभाजन को खत्म कर सकते हैं. हालांकि अगर दोनों पार्टियां दिल्ली में सहयोग करते हुए ओडिशा में कड़वी पक्षपातपूर्ण लड़ाई लड़ रही हैं तो यह व्याख्या करना कठिन है.