राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने यूनिवर्सिटी हंगामों के बारे में कहा कि असहिष्णु लोगों के लिए देश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्रों को चाहिए वे डिबेट-डिस्कशन में हिस्सा लें ना कि हिंसा फैलाएं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी कोच्चि में राजामौनी लेक्चर के 6वें संस्करण में बोल रहे थे।Also Read - West Bengal Politics: कांग्रेस छोड़ TMC में शामिल हुए पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत, बहन शर्मिष्ठा ने लिखा- दुखद

राष्ट्रपति ने अपने सम्बोधन मेें रामजस कालेज का जिक्र किए बिना कहा कि चाहे दक्षिण पंथ हो या वामपंथ उन्हे समाज का माहौल खराब करने, हिंसा फैलाने या देशद्रोह की बात करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। Also Read - मोदी ने लोकप्रियता से हासिल किया प्रधानमंत्री का पद, मनमोहन को सोनिया से मिला : 'द प्रेसिडेंसियल ईयर्स' में प्रणब मुखर्जी

Also Read - प्रणब मुखर्जी की किताब में पंडित नेहरू को लेकर कई दावे- भारत में विलय चाहता था नेपाल, लेकिन....

प्रणब मुखर्जी ने कहा कि “प्राचीन काल से ही भारत विचार, भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का केंद्र रहा है।” “हमारे समाज की पहचान असमान विचारों तथा बहसों को लेकर रही है।”

उन्होंने कहा कि, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे संविधान द्वारा दिए मौलिक अधिकारों में से एक हैं। वैध आलोचना व मतभेद की जगह होनी चाहिए।” राष्ट्रपति ने दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई घटना पर उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि छात्रों को बहस करना चाहिए न कि झड़प में उलझना चाहिए।

इसके बाद उन्होंने कहा कि “उच्च शिक्षा के हमारे प्रमुख संस्थान वाहन रहे हैं, जिन पर सवार होकर भारत ने खुद को एक समझदार समाज में तब्दील किया है।” यह टिप्पणी पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में आरएसएस से संबद्ध एबीवीपी और वाम समर्थित ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) के बीच हिंसक झड़प की घटना के मद्देनजर आई है।

इसके अलावा उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि 1950 के दशक में वृद्धि दर बढ़कर 1 से 2 प्रतिशत और जबकि 60 के दशक में 3-4 प्रतिशत पर पहुंच गयी। 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के साथ यह बढ़कर 6 से 7 प्रतिशत हो गयी। ‘इंडिया एट 70’ विषय पर मुखर्जी ने कहा कि 15 साल में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7 प्रतिशत से अधिक रही है और इसके साथ दुनिया की तेजी से वृद्धि करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बन गयी।