पंजाब विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिन्दर सिंह का जादू चला और कांग्रेस ने राज्य में ज़बरदस्त वापसी की। पार्टी को लोगों ने स्पष्ट बहुमत दिया। कांग्रेस ने सत्तासीन शिरोमणि अकाली दल को हाशिये पर धकेलते हुए उन्हें विपक्ष में बैठने को मजबूर किया। वहीं, दिल्ली से बाहर पांव पसारने के आम आदमी पार्टी के सपनों पर भी पानी फेर दिया। सूबे में कांग्रेस को 77 सीट मिली, आप केवल 20 सीटों पर ही सिमट गई। अकाली-बीजेपी गठबंधन को केवल 18 सीटों से संतुष्ट रहना पडा। यह भी पढ़े: पंजाब विधानसभा चुनाव 2017- कांग्रेस को बहुमत, देखें सभी विजयी उम्मीदवारों की लिस्ट

बात की जाये आम आदमी पार्टी की तो वह कई मायनों में जीती हुई बाज़ी हारी है। कुछ महीनो पहले तक आप को सूबे में सत्ता स्थापित करने के लिए सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था। सियासी पंडित कांग्रेस को राज्य में दुसरे नंबर की पार्टी बनने की बात कर रहे थे। मगर परिणाम बिलकुल अलग आये। कांग्रेस को सूबे में पूर्ण बहुमत मिला और कैप्टन अमरिंदर सिंह का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ़ हो गया। पंजाब में आम आदमी पार्टी के प्रमुख नेता हिम्मत सिंह शेरगिल और भगवंत मान को भी लोगों ने पसंद नहीं किया और दोनों भी चुनाव हार गए।

पंजाब में आप की हार का मुख्य कारण:

मुख्यमंत्री का चहरा नहीं होना: दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत के कारणों में से एक कारण यह भी था की उनकी पार्टी ने केजरीवाल को सीएम का उम्मीदवार बनाया था। पंजाब में ऐसा नहीं हुआ। पंजाब में आप ने किसी को भी सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट नहीं किया। वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस के पास कैप्टन अमरिन्दर सिंह जैसा मज़बूत कैंडिडेट था जिसे लोगों ने पसंद किया।

नवजोत सिंह सिद्धू का कांग्रेस में जाना: पिछले साल जब नवजोत सिंह सिद्धू बीजेपी को छोड़ा था तब कयास लगाए जा रहे थे की वे आम आदमी पार्टी में शामिल होंगे। ऐसा भी बताया जाता है की सिद्धू और केजरीवाल की मुलाक़ात भी हुई थी मगर दोनों के बीच सहमति नहीं बन पायी। सिद्धू ने कांग्रेस का दामन थामा जिसका उन्हें फायदा हुआ। अगर सिद्धू आम आदमी पार्टी ज्वाइन करते तो शायद नतीजे कुछ अलग हो सकते थे।

सुच्चा सिंह छोटेपुर को संयोजक पद से हटाना: पिछले साल अगस्त के महीने में आप ने पंजाब के अपने संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर को पद से हटा दिया। एक स्टिंग ऑपरेशन में छोटेपुर कथित रूप से विधानसभा टिकट के ऐवज में पैसे लेते दिख रहे थे, हालांकि वह इसे अपने खिलाफ साजिश करार देते रहे। केजरीवाल ने उनकी बात नहीं सुनी और उन्हें पद से हटा दिया। छोटेपुर ने बगावत की और राज्य की ज़्यादातर सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे जिसका खामियाज़ा आम आदमी पार्टी को भुगतना पड़ा।

सिरसा डेरा का अकाली-बीजेपी गठबंधन को समर्थन देना: पंजाब की राजनीति में सिरसा डेरा की अहम् भूमिका है। उनकी पंजाब के गावों में काफी पकड़ है। उनसे काफी लोग जुड़े हैं। इतना ही नहीं राज्य के दलित समुदाय में भी इस डेरे का काफी प्रभाव है। वह हर चुनाव से पहले किसी एक पार्टी का समर्थन करते है। इस बार उन्होंने बीजेपी-अकाली गठबंधन को अपना समर्थन दिया था जिसके बाद आम आदमी पार्टी के पैरों के तले से जमीन सरक गई।

दोआबा और माझा में कमज़ोर संगठन: आम आदमी पार्टी का ज़्यादा ज़ोर मालवा में ही देखने को मिला। पार्टी ने दोआबा और माझा पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जिसका खामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ा। दोआबा में कांग्रेस और अकाली आगे रहे हैं।

इसके अलावा विरोधी पार्टियों ने यह भी प्रचार किया था की आप के संयोजक जो एक हरयाणवी हिन्दू हैं, सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होना चाहते है। शायद पंजाब की जनता को पंजाब का ही मुख्यमंत्री चाहिए था। इसके अलवा  कैप्टन अमरिन्दर सिंह के रूप में लोगों को एक मजबूत नेतृत्व नज़र आया जिसके पीछे वे पूरी ताकत के साथ खड़े हो गए।