Rahat Indori Death: राहत इंदौरी नहीं रहे. इंदौर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. करीब 70 साल के राहत इंदौरी शायरी की दुनिया के वो नाम थे, जिसे हर पढ़ने, लिखने और सुनने वाला मंच पर देखना और सुनना चाहता था. लोग घंटों उनकी शायरी सुनने के लिए इंतज़ार करते थे. वह देश के ऐसे शायर थे, जिनकी शायरी में बगावत थी और बेपनाह मोहब्बत भी. असली नाम राहत कुरैशी था, लेकिन अपने शहर को अपनी पहचान बनाते हुए इंदौरी जोड़ लिया और इंदौरी के रूप में पूरे देश और दुनिया तक पहुँच गए. डॉ. राहत इंदौरी (Rahat Indori) उर्दू के प्रोफ़ेसर रहे थे. कई सम्मानों से उन्हें नवाज़ा गया. वह देश के ऐसे शायर थे, जो मौजूदा समय में सबसे अधिक मशहूर थे. Also Read - आखिरी सफर: सुपुर्दे-खाक किए गए 'ए मौत तूने मुझे ज़मीदार कर दिया' कहने वाले राहत इंदौरी

राहत इंदौरी के कुछ चुनिंदा शेर (Rahat Indori ke Chuninda Sher)
1. मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना
लहू से मेरी पेशानी पर हिंदुस्तान लिख देना Also Read - 'हमारे दोस्त को कमबख्त कोरोना खा गया, छोटा मोटा हार्ट अटैक तो राहत इंदौरी ऐसे ही झेल जाते'

2. अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है Also Read - #RahatIndori: अब ना मैं हूं, ना बाकी हैं जमाने मेरे....आंसुओं में डूबा सोशल मीडिया, राहत इंदौरी को याद कर रहे लोग

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है.

3. कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए
अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए

सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़
सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए

मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था
हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए

नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र
आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए

सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार
आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए

अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर
मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए.

4. सोचता हूँ कोई अखबार निकाला जाये
सबकी पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए
सोचता हूँ कोई अखबार निकाला जाये

पीके जो मस्त हैं उनसे तो कोई खौफ़ नहीं
पीकर जो होश में हैं उनको संभाला जाए

आसमां ही नहीं, एक चाँद भी रहता है यहाँ
भूल कर भी कभी पत्थर न उछाला जाए

5 तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

6. अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है
जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे

7. बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यार से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ

8. शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

9. आंख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

10. मेरे हुजरे में नहीं और कहीं पर रख दो
आसमां लाए हो ले आओ ज़मीं पर रख दो

11. बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हम ने ख़ैरात भी माँगी है तो ख़ुद्दारी से

12. हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दुआ’ नहीं देंगे
ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे

राहत इंदौरी मुशायरों में कहा करते थे कि उनकी शायरी कई बार सरकारों और व्यवस्था को पसंद नहीं आती है. राहत को ये बात पता थी, लेकिन वह कभी रुके नहीं. उनके कई शेरों ने धरना प्रदर्शनों को पहचान दी.