अलाउद्दीन पेशे से डॉक्टर हैं और राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में लोग उन्हें ‘हाकिम साहब’ कहते हैं. जब इनके नाम के बारे में पूछा जाता है तो वह जोर से हंसते हुए कहते हैं हां, वही जो आप समझ रहे हैं वही अलाउद्दीन. दरअसल, 13वीं शताब्दी की रानी पद्मावती और अलाउद्दीन का इतिहास बॉलीवुड फिल्म पद्मावत के आ जाने के बाद एक बार फिर चर्चा में है. ऐसे में अलाउद्दीन नाम का प्रत्याशी चर्चा मे है.

अलाउद्दी कोई पहली बार चुनावी मैदान में नहीं हैं. वह साल 2013 के चुनाव में भी बीएसपी के टिकट पर ही मैदान में थे. लेकिन, उस दौरान न तो पद्मावत फिल्म आई थी और न ही 13वीं शताब्दी के अलाउद्दीन पर कोई विवाद इस तरह जमीन पर उतरा था. लेकिन अब अलाउद्दीन के नाम को लेकर लोग हंसते भी हैं और मजे भी लेते हैं. इस पर अलाउद्दीन कहते हैं कि इतिहास के उस मुद्दे पर वह बात नहीं करना चाहते. जो गलत है, वह गलत ही होता है.

अलाउद्दीन कहते हैं, ‘वह इस सीट पर पिछली बार भी लड़े थे और इस बार भी मैदान में हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस सोचती है कि सिर्फ वह मुसलमानों की हिमायती है. वहीं, बीजेपी हमेशा हमें इग्नोर करती है. उत्तर प्रदेश में एसपी और बीएसपी हमारे बारे में सोचती हैं. यही कारण है कि एक बार फिर मैं बीएसपी के टिकट पर मैदान में हूं.’

यह है चुनावी मुद्दा
वह कहते हैं कि राज्य के मुस्लिम युवक पढ़ने के लिए मदरसा, नौकरी और बैकवर्ड क्लास को मिलने वाले सारे अधिकार चाहते हैं. इसे लेकर चित्तौरगढ़ में वह कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं. लेकिन हर बार उनकी मांग को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. उनका मानना है कि वह इन्हीं अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए विधानसभा में पहुंचना चाहते हैं.

तीनों राज्य में लड़ रही है बीेएसपी
बता दें कि बीएसपी राजस्थान में 190 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसके पहले वह छत्तीसढ़ में अजीत जोगी की पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ चुकी है और मध्यप्रदेश में बी वह अपने परंपरागत वोटरों के सहारे मैदान में है. ऐसे में बीएसपी को उम्मीद है कि वह तीनों राज्यों में बेहतर करेगी और सम्मानजनक सीटें जीतेगी.