महिला को सड़क पर बच्चे को जन्म देने के लिए किया गया मजबूर, राजस्थान HC ने केंद्र,राज्य को 4 लाख का मुआवजा देने को कहा

जज ने कहा- "ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब भारत संघ 'स्वास्थ्य' विषय को सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा मान रहा है और इसे राज्य सरकारों की चिंता बना रहा है. ये कतई स्वीकार्य नहीं है और ऐसा प्रतीत होता है कि ये अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर थोपने का मामला है."

Published date india.com Published: February 21, 2024 3:58 PM IST
Rajasthan High Court (Photo File)
Rajasthan High Court (Photo File)

राजस्थान हाईकोर्ट (Rajasthan High Court) ने हाल ही में केंद्र सरकार और राजस्थान सरकार को एक महिला को 4 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया. दरअसल, 2016 में महिला को दो बच्चों को जन्म देने के लिए मजबूर किया गया था, जिनकी बाद में बीच सड़क पर मृत्यु हो गई थी. जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने कहा कि खेड़ली में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में तैनात कर्मचारियों की लापरवाही के कारण महिलाओं ने अपने दो बच्चों को खो दिया, जो “मानवता की मौत” को दर्शाता है. कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ अधिकारियों को कानून के अनुसार दोषी व्यक्तियों के खिलाफ विभागीय जांच समाप्त करने का भी निर्देश दिया. इसके साथ ही अदालत ने इस संबंध में निष्क्रियता की निंदा की.

क्या है पूरा मामला?

7 अप्रैल, 2016 को फूलमती को ममता कार्ड के अभाव में इलाज से इनकार कर दिया गया था. बता दें, ममता कार्ड गर्भवती महिलाओं को लाभ पहुंचाने के लिए शुरू किया गया था. बाद में उसने सड़क पर ही बच्चों को जन्म दिया. उनमें से एक की अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई, जबकि दूसरे की इलाज के अभाव में मौत हो गई. महिला ने दोषी स्वास्थ्य कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई और गर्भवती महिलाओं के लिए बनाई गई विभिन्न योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन की मांग करते हुए 2016 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?

मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि शिशु एवं मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए भारत सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं का समूह राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (एनएमबीएस), राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (एनएफबीएस), राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम), जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) है. गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के कल्याण के लिए उपरोक्त कई लाभकारी योजनाएं होने के बावजूद, उत्तरदाता याचिकाकर्ता और उसके नवजात शिशुओं को इन योजनाओं का लाभ प्रदान करने में अपने कर्तव्यों का पालन करने में बुरी तरह विफल रहे हैं.

योजनाओं के कार्यान्वयन में केंद्र की भूमिका पर न्यायालय ने कहा,

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” भारत सरकार केवल तकनीकी आधार पर अपने दायित्व से बच रही है कि स्वास्थ्य एक राज्य का विषय है. स्वास्थ्य का अधिकार केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया एक राष्ट्रीय अभियान है और अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने की जिम्मेदारी पूरी तरह से भारत संघ के कंधों पर होनी चाहिए.”

जज ने कहा,

“ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब भारत संघ ‘स्वास्थ्य’ विषय को सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा मान रहा है और इसे राज्य सरकारों की चिंता बना रहा है. ये कतई स्वीकार्य नहीं है और ऐसा प्रतीत होता है कि ये अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर थोपने का मामला है.”

हालांकि कोर्ट ने ये भी कहा कि योजनाओं का कार्यान्वयन राज्य पर निर्भर है, लेकिन इस बात पर जोर दिया कि ऐसे कार्यक्रमों की सफलता के लिए राज्य सरकार के साथ संघ का सहयोग अपरिहार्य है.

कोर्ट ने कहा कि सहकारी संघवाद की दी गई संरचना में, भारत संघ किसी योजना के क्रियान्वयन और कार्यान्वयन को सुनिश्चित किए बिना अपने दायित्व को केवल लागू करने तक ही सीमित नहीं रख सकता है. कोर्ट ने जीवन की रक्षा के लिए सहायता प्रदान करने के चिकित्सा पेशेवरों के कर्तव्य पर भी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला घोर लापरवाही और विफलता है.

कोर्ट ने आदेश दिया,

“महिला को योजनाओं का न्यूनतम लाभ प्रदान करने से इनकार करने पर भारत संघ और राज्य सरकार तीन की अवधि के भीतर 4 लाख की राशि में उसे मुआवजा देने के लिए संयुक्त रूप से और गंभीर रूप से उत्तरदायी होंगे.”

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राशि तीन साल की अवधि के लिए सावधि जमा में जमा की जाएगी और अर्जित ब्याज हर तिमाही में फूलमती के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाएगा. और याचिकाकर्ता तीन साल की अवधि पूरी होने के बाद ही सावधि जमा को भुना सकेगा.

इसके अलावा, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को तीन महीने की अवधि के भीतर 25,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया।

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