नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में मुस्लिम पक्ष के एक वरिष्ठ वकील ने अपना आपा खोते हुए गुरुवार को एक न्यायाधीश से कहा कि वह उनके लहजे में एक तरह की आक्रामकता देख रहे हैं. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस दशकों पुराने मामले में 27वें दिन सुनवाई की. किंतु पीठ भोजनावकाश के बाद दोबारा नहीं बैठी. एक सूत्र ने बताया कि प्रधान न्यायाधीश की तबीयत ठीक नहीं है.

सूत्र ने कहा, प्रधान न्यायाधीश की तबीयत कुछ ठीक नहीं है और इसी कारण भोजनावकाश के बाद पीठ नहीं बैठी. इससे पूर्व पीठ ने सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा मूल याचिकाकर्ता एम सिद्दिक सहित अन्य की तरफ से दलील दे रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन से एक गवाह की गवाही के बारे में प्रश्न किया. यह गवाह 1935 में विवादित स्थल पर गया था और उसने 2000 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष गवाही दी थी.

संविधान पीठ में न्यायमूर्ति एस.ए. बोबड़े, न्यायमूर्ति डी.वाई. चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण एवं न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल हैं. पीठ ने धवन से गवाह रामसूरत तिवारी की गवाही के कुछ अन्य अंश पढ़ने को कहा. यह अंश विवादित स्थल पर बने जंगले (रेलिंग) पर हिंदुओ द्वारा की जाने वाली पूजा-अर्चना के संदर्भ में है.

न्यायमूर्ति भूषण ने धवन से कहा, इस गवाह ने कहा है कि वह 1935 में वहां (स्थल पर) गया था. उसका बयान पढ़िए, हम इस पर विश्वास करते हैं या नहीं, यह एक अन्य बात है. धवन ने कहा, मैं न्यायाधीश के लहजे में एक प्रकार की आक्रामकता देख रहा हूं. उन्होंने कहा, ”यदि न्यायाधीश कह रहे हैं कि मैं साक्ष्यों को तोड़ मरोड़ रहा हूं तो मैं उसे पढ़ दूंगा. न्यायाधीश ने कहा कि यह तोड़ने मरोड़ने के बारे में नहीं है. बिंदु है कि क्या कुछ तथ्य हैं या नहीं?

वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन एवं रंजीत कुमार ने धवन की इस टिप्पणी पर आपत्ति व्यक्त की. इस पर धवन ने फौरन पीठ से क्षमा मांग ली. उन्होंने कहा, मैं क्षमा चाहता हूं. कई बार में हतप्रभ हो जाता हूं. मैं भयभीत हो जाता हूं कि मुझे क्या करना चाहिए….जब सुनवाई इतने लंबे समय से चल रही हो तो कई बार हम उत्तेजित हो जाते हैं.

इस पर प्रधान न्यायाधीश ने मुस्कुराते हुए टिप्पणी की, डॉ धवन, उत्तर पश्चिम सीमांत से आने वाले लोग भयभीत नहीं होते. हम इतिहास से प्रभावित है.

धवन ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी को अटकल बताया था कि विवादित ढांचे के मुख्य गुंबद में हिन्दू लोग किसी प्रकार की दिव्यता का वास मानते हैं और इसी कारण वह ब्रिटिश शासकों द्वारा 1858 में बनवाए गए जंगले की पूजा-अर्चना करते थे. हालांकि धवन ने फौरन इसके लिए क्षमा मांग ली.

इससे पहले गुरुवार को धवन ने अपनी दलील शुरू करते हुए सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्ष की ओर से दी गई विभिन्न गवाहियों का हवाला देते हुए यह साबित करने का प्रयास किया कि विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद थी तथा वे (हिंदू पक्ष) यह सिद्ध करने में विफल रहे कि मुख्य गुंबद के ठीक नीचे ही भगवान राम का जन्मस्थान था.

उन्होंने निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवर दास द्वारा 1885 में दाखिल दायर वाद का हवाला दिया और कहा कि वह स्थल के बाहरी परिसर में राम चबूतरा मंदिर का निर्माण करवाने जा रहे थे. धवन ने कहा कि फैजाबाद के उप न्यायाधीश ने याचिका को स्वीकृति नही दी थी तथा इस तरह का निष्कर्ष है कि मुस्लिम अंदर नमाज पढ़ रहे थे तथा बाहरी परिसर में हिन्दू पूजा कर रहे थे.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा कल की गई इस टिप्पणी का जवाब दिया कि जंगले के समीप राम चबूतरा इसलिए बनाया गया, क्योंकि हिंदू मुख्य गुंबद में किसी प्रकार की दिव्यता का वास मानते थे. यही कारण था कि वे जंगले की पूजा-अर्चना करते थे. धवन ने कहा कि इस बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं कि हिंदू जंगले या ग्रिल वाली दीवार की पूजा-अर्चना करते थे.

उन्होंने इसके बाद तिवारी के साक्ष्य की चर्चा की. सर्वोच्च न्यायालय चाहता था कि धवन तिवारी के बयान को पूरी तरह पढ़े ताकि स्पष्ट तस्वीर उभर कर आ सके. धवन ने कहा कि तिवारी अपने चाचा के साथ दिसंबर 1935 में वहां तब गए थे, जब वह 12-13 वर्ष आयु के थे. उन्होंने कहा कि विवादित स्थल पर उन्होंने एक प्रतिमा एवं एक फोटोग्राफ देखा था.

उन्होंने कहा कि गवाह ने बताया कि वह एक अनिश्वरवादी है और यह मानता है कि भगवान राम का जन्म मुख्य गुंबद के नीचे हुआ था. उसने 1935 में जो देखा, उसे 2000 में अदालत में वर्णित किया था. उन्होंने यह भी कहा कि तिवारी के साक्ष्य में कई विसंगतियां हैं और वह कुछ भी याद नहीं कर पा रहा है.

बहरहाल, पीठ ने कहा कि इस बात के साक्ष्य हैं कि 1949 से पहले मुख्य गुंबद के नीचे उसने प्रतिमाएं देखी थीं. आरोप है कि 1949 में प्रतिमाओं को वहां गुपचुप ढंग से रख दिया गया. धवन ने कहा कि सभी साक्ष्य 1989 के बाद आए जब भगवान की ओर से वाद दाखिल किया गया और ये विश्वस्त साक्ष्य नहीं हैं. उन्होंने यह भी कहा कि रथ यात्रा एवं ढांचे के विध्वंस के बाद राम जन्मभूमि एक बड़ा मुद्दा बन गया और ये साक्ष्य इन घटनाओं के बाद दर्ज किए गए.

उन्होंने साक्ष्य के बारे में कानून के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि गवाह के बयानों के प्रति गहरा सम्मान जताते हुए यह कहा जा सकता है कि उन्हें विश्वस्त साक्ष्य नहीं माना जा सकता. सुनवाई शुक्रवार को जारी रहेगी.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार दिवानी वाद पर 2010 में दिए गए अपने निर्णय में विवादित स्थल की 2.77 एकड़ भूमि को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़े और राम लला के बीच बराबर तीन हिस्सों में बांट दिया था. इस निर्णय के खिलाफसुप्रीम कोर्ट में 14 अपीलें दायर की गई हैं.