नयी दिल्ली: करीब 70 साल तक वकालत करने वाले राम जेठमलानी ने फौजदारी मुकदमों से लेकर आर्थिक और कारोबारी विवाद और संवैधानिक मामलों में अदालतों में दलीलें रखीं. एक वकील के तौर पर जेठमलानी 1959 में सुर्खिंयों में आए. तब वह के एम नानावटी बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में अभियोजकों की टीम में थे. इस मामले में नौसेना कमांडर पर अपनी पत्नी के प्रेमी की हत्या का मुकदमा चलाया गया था.

 


जेठमलानी पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे. इस वजह से उन्होंने अदालत में सुनवाई में हिस्सा लेना बंद कर दिया था. मगर वह बीते 10 बरस के दौरान काफी संवेदनशील आपराधिक मामलों में अदालत में पेश हुए थे. उन्होंने संप्रग सरकार के दौरान कालेधन को लेकर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी और शीर्ष अदालत ने सरकार के लिए कई निर्देश जारी किए थे. दिग्गज वकील ने विभिन्न पार्टियों के नेताओं, बड़े कारोबारियों और कॉरपोरेट घरानों, बॉलीवुड कलाकारों और अंडरवर्ल्ड डॉन के मुकदमे लड़े हैं. 17 साल की उम्र में विधि स्नातक होने के बाद वह अविभाजित भारत के कराची (जो अब पाकिस्तान में है) की एक अदालत में पेश हुए थे लेकिन स्वतंत्र के बाद 1948 में भारत आ गए थे. उन्होंने आज़ादी के बाद सबसे अहम मुकदमा बंबई शरणार्थी अधिनियम के खिलाफ लड़ा था और जीत दर्ज की थी. यह कानून सरकार को यह अधिकार देता था कि वह शरणार्थियों के स्थान में परिवर्तन कर सकती हैं, उन्हें अलग कर सकती है और उनसे कभी भी पूछताछ कर सकती है. कानूनी पेशे से जुड़े लोग जेठमलानी को फौजदारी मामलों का बेहतरीन वकील मानते थे.

जेठमलानी उन वकीलों में से थे जिन्होंने इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल और आतंरिक सुरक्षा कानून का विरोध किया था. यह विवादित कानून सरकार को इंदिरा गांधी के फैसलों का विरोध करने वालों को मनमाने तौर पर गिरफ्तार करके जेल भेजने का अधिकार देता था. जेठमलानी का मानवीय पक्ष तब दिखा जब उन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में आरोपी केहर सिंह और बलबीर सिंह का बचाव करने का फैसला किया. उन्होंने बलबीर सिंह को बरी भी करा लिया था. जब बलबीर सिंह के बेटे राजिंदर सिंह को सरकारी नौकरी से बर्खास्त किया गया तो उन्होंने उसे अपने दफ्तर में नौकरी पर रख लिया. जेठमलानी के साथ काम करने वाले वकील उन्हें ‘ मानवाधिकारों का असल समर्थक’ बताते हैं. उन्होंने 75 साल लंबे अपने वकालत के करियर में गैर कानूनी तौर पर हिरासत में रखने के कई मुकदमे लड़े. इनमें 1980 के दशक में पंजाब में आतंकवाद के दौरान संत लोंगोवाल को हिरासत में लेने मामला शामिल है. इसके अलावा, वह कई संवेदनशील, मुश्किल और विवादित मामलों में अदालतों में पेश हुए.

इंदिरा गांधी हत्याकांड में आरोपियों के वकील के अलावा उन्होंने 2011 में मद्रास उच्च न्यायालय में राजीव गांधी के कातिलों का भी बचाव किया. जेठमलानी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस ए आर गिलानी का भी बचाव किया था जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने 2001 में संसद पर हुए हमला मामले में बरी कर दिया था. जेठमलानी सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में आरोपों का सामना कर रहे अमित शाह के भी वकील रहे. इस मामले में शाह को आरोप मुक्त कर दिया गया. वह शेयर बाजार घोटाले में हर्षद मेहता और केतन पारेख के लिए पेश हुए जबकि जेएमएम रिश्वतखोरी मामले में नरसिम्ह राव के खिलाफ पेश हुए. वह गैस आपूर्ति को लेकर अंबानी भाइयों के बीच विवाद में अनिल अंबानी की रिलायंस नेचुरल रिसोर्स लि के वकील रहे.

उन्होंने जेसिका लाल हत्या मामले में कांग्रेस के एक नेता के बेटे मनु शर्मा का मुकदमा लड़ा. वह दिवंगत अरूण जेटली की ओर से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ दायर मानहानि मामले में केजरीवाल की ओर से पेश हुए थे. वह जैन हवाला मामले में लाल कृष्ण आडवाणी, आय से अधिक संपत्ति मामले में जयललिता, 2जी घोटाले में कनिमोई, चारा घोटाले में लालू प्रसाद, और खनन घोटाले में बीएस येदियुरप्पा के वकील रहे. उन्होंने 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोट मामले में उच्चतम न्यायालय में संजय दत्त की जमानत के लिए दलीलें रखीं. जब बोफोर्स मामला सामने आया तो उन्होंने राजीव गांधी के सामने रोजाना 10 सवाल रखे. उन्होंने बाद में इस मामले में हिन्दुजा बंधुओं का बचाव भी किया. वह मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान के भी वकील रहे. उन्होंने जोधपुर में 2013 में नाबालिग के साथ हुए बलात्कार मामले में स्वयंभू बाबा आसाराम बापू का भी प्रतिनिधित्व किया.