
Shivendra Rai
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले शिवेन्द्र राय को हिंदी डिजिटल पत्रकारिता में 5 साल का अनुभव है. वाराणसी के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से इतिहास में एमए ... और पढ़ें
India’s journey to becoming a republic: कुछ तारीखें सिर्फ कैलेंडर में दर्ज एक नंबर नहीं होती हैं. ये देश के लिए काफी खास होती हैं. ऐसी ही एक तारीख है 24 जनवरी. साल 1950 में 24 जनवरी के दिन ही आजाद भारत ने अपने लोकतांत्रिक सफर को स्थायी प्रतीक और सशक्त नेतृत्व के साथ दिशा दी थी. इसी दिन देश ने जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया था. 24 जनवरी 1950 को ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद के रूप में स्वतंत्र भारत को उसका पहला राष्ट्रपति मिला.
स्वतंत्रता आंदोलन की आग में तपकर निकला ‘जन गण मन’ पहले ही भारतीयों के दिलों में देशभक्ति की लौ जला चुका था. 1911 में नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा मूल रूप से बांग्ला भाषा में रचित यह गीत भारतीय आत्मसम्मान और एकता की आवाज बन गया. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने लोगों में देश के प्रति गर्व और समर्पण की भावना को और प्रबल किया था.
संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को जन गण मन के हिंदी संस्करण को भारत के राष्ट्रगान के रूप में आधिकारिक रूप से अपनाया. हालांकि बहुत पहले 27 दिसंबर 1911 को ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता सत्र में इसकी गूंज सुनाई दे चुकी थी. तब इसे पहली बार इसे सार्वजनिक मंच पर गाया गया था. जन गण मन केवल एक गीत नहीं रहा बल्कि भारत की विविधता में एकता का स्वर बन गया.
राष्ट्रगान में देश के विभिन्न भूभागों का उल्लेख इस एकता को और मजबूती देता है. इसमें पंजाब, सिंधु (जो वर्तमान में पाकिस्तान का एक राज्य है), गुजरात, मराठा यानी महाराष्ट्र, द्राविड़ अर्थात दक्षिण भारत, उत्कल (वर्तमान में कलिंग) और बंग यानी बंगाल का उल्लेख है. यह उल्लेख भारत की भौगोलिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक विविधता को भी एक सूत्र में पिरोता है.
इसी ऐतिहासिक दौर में भारत को उसका पहला संवैधानिक प्रमुख भी मिला. डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने. वे भारतीय इतिहास में ऐसे इकलौते नेता रहे जिन्होंने लगातार दो बार राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी निभाई. उनका राष्ट्रपति बनना लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाला कदम था जिसने नवगठित गणराज्य को स्थिरता और गरिमा प्रदान की.
24 जनवरी 1950 का दिन इसलिए विशेष है क्योंकि इसी कालखंड में भारत ने अपने गणतांत्रिक स्वरूप की नींव रखी. एक ओर राष्ट्रगान के रूप में देश की आत्मा को आवाज मिली तो दूसरी ओर राष्ट्रपति के रूप में संविधान के संरक्षक का चयन हुआ. आज जब राष्ट्रगान की धुन गूंजती है और राष्ट्रपति पद की गरिमा दिखाई देती है तो 24 जनवरी 1950 का वह ऐतिहासिक दिन याद आता है जब स्वतंत्र भारत ने खुद को पहचाना, स्वीकार किया और भविष्य की ओर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाया.
(एजेंसी इनपुट के साथ)
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