नई दिल्ली. मध्यप्रदेश के ग्वालियर में शुरू राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तीन दिवसीय बैठक में राम मंदिर को लेकर चर्चा हुई. इस दौरान आरएसएस ने कहा, राम जन्मभूमि विवाद को जल्द सुलझाने की जगह सुप्रीम कोर्ट ने एक नया रुख अपनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू आस्था से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे को किसी तरह की प्राथमिकता नहीं दी. इतना ही नहीं इसमें ये भी कहा गया है कि हिंदुओं की लगातार उपेक्षा हो रही है. संघ के वक्ताओं ने कहा, हम न्यायिक प्रक्रिया का पूरा सम्मान करते हैं. लेकिन विवाद पर निर्णय जल्द से जल्द होना चाहिए. मंदिर निर्माण में आने वाली बाधाओं को खत्म करना चाहिए.

आरएसएस ने इसके बाद सबरीमाला मंदिर का जिक्र किया. इसमें कहा गया कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित संस्थाओं और रीति-रिवाजों का अनदेखा किया. संघ ने कहा कि पीठ की अकेली महिला सदस्य की राय लिए बिना निर्णय दिया. राज्य सरकार ने गैर-हिंदू और गैर-भक्त महिलाओं के जबरन प्रवेश की सुविधा देकर हिंदू समाज के प्रति अनुचित जल्दबाजी और राजनीतिक दुर्भावना दिखाई.

मध्यस्थता कमेटी का हुआ गठन
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील दशकों पुराने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद का सर्वमान्य समाधान खोजने के लिए शुक्रवार को शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश एफएमआई कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति गठित कर दी. इस समिति को आठ सप्ताह के भीतर मध्यस्थता की कार्यवाही पूरी करनी है.

तमिलनाडु के रहने वाले हैं तीनों मध्यस्थ
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने आदेश में कहा कि मध्यस्थता के लिये गठित समिति के अन्य सदस्यों में आध्यात्मिक गुरु और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर और प्रख्यात मध्यस्थ एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पांचू शामिल हैं। दिलचस्प बात है कि तीनों मध्यस्थ तमिलनाडु के रहने वाले हैं, जहां अयोध्या विवाद का कुछ खास प्रभाव नहीं है. संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं.