Vladimir Putin’s india visit: रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन गुरुवार को भारत की यात्रा पर आ रहे हैं. इस दौरान वह भारत को S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम बेचने सहित कई अहम सौदे पर हस्ताक्षर करेंगे. भारत द्वारा रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने का अमेरिका खुलेआम विरोध कर रहा है. वह ऐसा करने पर भारत पर प्रतिबंध लगाने का कानून भी बना चुका है. ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में दशकों से रूस और अमेरिका एक दूसरे के विरोधी रहे हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि भारत जिस S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम को रूस से खरीदने जा रहा है, उसे रूस हमसे पहले चीन को बेच चुका है. एक तरह से देखें तो रूस दो प्रतिद्वंद्वी एशियाई देशों, भारत और चीन के बीच शानदार संतुलन बनाने में कामयाब रहा है. उसने इन दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों को अमेरिकी विरोध के बावजूद अरबों डॉलर के अपने हथियार बेचने में सफलता हासिल की है.

forbes.com के लिए ‘Why Russia Won’t Choose Sides Between China And India’ शीर्षक से लिखे एक लेख में साउथ ईस्ट एशिया के पत्रकार डेविड हट लिखते हैं कि मौजूदा समय में रूस की रणनीति भारत के साथ चीन को साधने की है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के प्रभुत्व से निपटने के लिए रूस को चीन से दोस्ती तो चाहिए, लेकिन एशिया में चीन की दादागीरी भी उसके लिए चिंता की बात है. इसलिए वह चीन को काउंटर करने के लिए भारत के साथ अपने रिश्तों को भी अहमियत देता है. वैसे भी रूस और भारत के रिश्ते सोवियत काल से ही सामरिक रहे हैं. इस लेख में डेविड हट लिखते हैं कि भारत और चीन के बीच तनाव की स्थिति में रूस अक्सर तटस्थ रहता है. यहां तक कि पिछले साल डोकलाम विवाद के वक्त भी रूस तटस्थ रहा और इसको लेकर चीन के मीडिया में सवाल भी उठे कि इस मामले में रूस का रूख क्या है.

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चीन के अलावा पाकिस्तान से भी पींगें लड़ा रूस
एशिया टाइम्स (atimes.com) के लिए India’s Russia conundrum: a question of balance शीर्षक से तेंजिन टॉपडेन ने लेख लिखा है. इस लेख में भारत, चीन, रूस और अमेरिका के बीच बदलते रिश्तों की पड़ताल की गई है. इस साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस की यात्रा की थी. उस वक्त से भारत के रूस से पांच S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने की बात चल रही है. इस डील को लेकर अमेरिका नाराज है, तो दूसरी तरफ रूस पाकिस्तान के साथ पींगें लड़ाने लगा है. इससे भारत के सामने अजीब स्थिति पैदा हो गई है. भारत आज भी अपनी रक्षा जरूरतों की पूर्ति के लिए काफी हद तक रूस पर निर्भर है. ऐसे में भारत, रूस को नाराज नहीं कर सकता.

अमेरिका का एंगल
तेंजिन टॉपडेन के अनुसार व्लादमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस एक ताकतवर देश के रूप में उभर रहा है. पुतिन की रणनीति अमेरिका को एक ही समय में कई मोर्चों पर जंग में धकेलने की रही है, ताकि अमेरिकियों की वित्तीय स्थिति पर बुरा असर पड़े. इसी कारण जब अमेरिका ने इराक से अपनी सेना बुलाई तो रूस ने जॉर्जिया में मोर्चा खोल दिया. इसके बाद उसने सीरिया में भी अमेरिका को उलझा रखा है. तेंजिन टॉपडेन आगे कहते हैं कि वैसे रूस द्वारा पाकिस्तान को हथियार बेचने और संयुक्त सैन्य अभ्यास करने का भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती नजदीकी से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है.

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रूस व चीन दोनों मजबूर
जहां तक रूस और चीन के रिश्ते की बात है तो यह एक तरह से पुतिन सरकार की मजबूरी है. रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों से उबरने के लिए चीन की जरूरत है, लेकिन वह (रूस) भी चीन को लेकर आश्वस्त नहीं है. रूस, चीन के बढ़ते प्रभाव (खासकर मध्य एशिया में) से चिंतित है. इस क्षेत्र को रूस अपना प्रभुत्व वाला इलाका मानता है. तेंजिन टॉपडेन आगे लिखते हैं कि जिस तरह से अमेरिका को टक्कर देने के लिए चीन का रूस से तेल खरीदना मजबूरी है, उसी तरह रूस के सामने चीन को संतुलित करने के लिए भारत को साधे रखना मजबूरी है. खासकर रूस के अपने हथियारों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है. इसी कारण रूस संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता से लेकर शंघाई सहयोग संगठन और एनएसजी तक में भारत की सदस्यता का समर्थन करता रहा है.

चीन को बेचा S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम
thediplomat.com की रिपोर्ट के मुताबिक रूस और चीन ने 2014 में अंतर सरकारी समझौते के तहत S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम का समझौता किया था. इस साल जून तक रूस ने इस समझौते के तहत चीन को इसकी पहली रेजिमेंट की आपूर्ति भी पूरी कर दी है. हालांकि चीन और रूस में से किसी ने इस आपूर्ति की आधिकारिक जानकारी नहीं दी है. यहां तक कि रूस ने चीन को कितना मिसाइल डिफेंस सिस्टम बेचा है, इसकी भी जानकारी का खुलासा नहीं हुआ है. लेकिन सूत्रों के हवाले से thediplomat.com लिखता है कि करीब तीन अरब डॉलर के इस सौदे के तहत रूस ने 4 से 6 डिफेंस सिस्टम बेचे हैं. S-400 को एक सबसे प्रभावी डिफेंस सिस्टम माना जा रहा है, हालांकि इसका कभी भी जंग के मैदान में परीक्षण नहीं किया गया है. अपुष्ट रिपोर्ट्स के मुताबिक चीनी सेना PLA इस डिफेंस सिस्टम की सेवा लेने लगी है.