केरल के सबरीमाला मंदिर बोर्ड के पुजारियों ने फिर एक नए बवाल खड़ा कर दिया है। यहं तक की इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देने की ज़रूरत पड़ गई है। हाल ही में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल के बीच की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राज्य सरकार और मंदिर बोर्ड को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि जब महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव वेदों, उपनिषदों या किसी भी शास्त्र में नहीं किया गया, तो सबरीमाला मंदिर में इस तरह के नियम क्यों बनाए गए हैं?

बता दें कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल के बीच की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिसे स्थायी करने को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट फैसला ले सकती है। मंदिर बोर्ड तथा सरकार को जवाब देने के लिए छह हफ्ते का वक्त देते हुए कोर्ट ने इस मामले में पुछा कि महिलाओं के प्रवेश बंद करने का फैसला कब लिया गया और इसके पीछे मंदिर बोर्ड की क्या वजह थी? कोर्ट ये जानना चाहती है कि समानता के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में रोक कहां तक ठीक है? इस मामले में संतुलन बनाना बहुत ही ज़रूरी है। इस मामले में कोर्ट ने वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन और के. रामामूर्ति को कोर्ट का सहायक नियुक्त किया है। वहीँ मंदिर बोर्ड ने कहा है कि ये प्रथा 1000 साल से चली आ रही है, तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट क्यों बोल रहा है? बोर्ड ने ये भी कहा है कि सिर्फ मंदिर में ही नहीं, बल्कि पूरे सबरीमाला पर्वत पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

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इसके पहले सबरीमाला मंदिर के बोर्ड के पुजारियों ने ऐसी मशीन की मांग की थी, जो महिलाओं में पीरियड्स की जांच करे। पुजारियों ने इस मशीन की मांग इसलिए की थी, क्योंकि उनका मानना है कि महिलाओं को पीरियड्स के दौरान मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए और इसलिए इस मशीन की मदद से महिलाओं की जांच की जानी चाहिए। इस मामले के बाद देशभर में महिलाओं ने अनुचित सोच का मुंहतोड़ जवाब देते हुए इस कैम्पेन में महिलाओं ने सेनेटरी पैड्स पर ’हैप्पी टू ब्लीड’ लिखकर फेसबुक पर अपलोड किया था। जिसकी मदद से लोगों ने इन पुजारियों की गिरी हुई सोच को लोगों के सामने लाने की कोशिश की थी।