नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट Supreme Court ने मौत की सजा पाए दोषियों को न्यायालय में अपील दाखिल करने के लिए मिली 60 दिन की समयसीमा पूरी होने से पहले ही सजा की तामील के लिए निचली अदालतों की ओर से ब्लैक वारंट यानि डेथ वारंट death warrant जारी किए जाने पर गुरुवार को सवाल उठाया. Also Read - COVID-19: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- निजी लैब्स में भी मुफ्त में हो कोरोना की टेस्टिंग

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के एक फैसले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि किसी दोषी के खिलाफ मौत का वारंट 60 दिन की उस अवधि के पूरे होने से पहले जारी नहीं किया जा सकता जो दोषी को हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने के लिए मिली है. Also Read - कोरोना वायरस के बारे में सही सूचना के लिये 24 घंटे में पोर्टल बनाये केन्द्र: सुप्रीम कोर्ट

पीठ ने कहा, ”हम जानना चाहते हैं कि इस संबंध में एक फैसला रहने के बावजूद निचली अदालतें ब्लैक वारंट जारी करने के आदेश कैसे पारित कर रही हैं.” Also Read - Covid-19: कोरोना के चलते मजदूरों का पलायन, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- 23 लाख लोगों को दे रहे हैं खाना

आगे पीठ ने कहा, ”किसी को तो यह समझाना ही पड़ेगा. न्यायिक प्रक्रिया को इस प्रकार से होने नहीं दिया जा सकता.” पीठ ने बलात्कार और हत्या के दोषी अनिल सुरेन्द्र सिंह यादव के खिलाफ गुजरात की सत्र अदालत द्वारा जारी ब्लैक वारंट पर रोक लगा दी.

साथ ही पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस संबंध में सहायता करने को कहा और उनसे उच्चतम न्यायालय के अदेश के बावजूद मृत्यु वारंट death warrant जारी होने के कारणों का पता लगाने को कहा.