नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने के लिए दायर याचिका बुधवार को खारिज कर दी,जिसमें एक हिन्दू महिला के मंदिर में जाने को अपमानजनक तरीके से पेश किया गया था. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि किसी लेखक के कार्य कौशल का सम्मान किया जाना चाहिए और पुस्तक को अंशों की बजाए संपूर्णता में पढ़ा जाना चाहिए. Also Read - SS Rajput death case: महाराष्‍ट्र सरकार ने SC को सौंपा सीलबंद लिफाफा, 11 अगस्‍त को सुनवाई

पीठ ने दिल्ली निवासी एन राधाकृष्णन की याचिका पर अपने फैसले में कहा कि किसी पुस्तक के बारे में अपने दृष्टिकोण को सेंसरशिप के लिए कानूनी दायरे में नहीं लाना चाहिए. पीठ ने कहा कि लेखक को अपने शब्दों का उसी तरह से खेलने की अनुमति दी जानी चाहिए, जैसे एक चित्रकार रंगों से खेलता है. Also Read - सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से कहा- कुछ इलाकों में 4जी इंटरनेट सेवा बहाल करने की संभावना तलाशें

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में लेखकर एस. हरीश की मलयाली उपन्यास ‘मीशा’ (मूंछ) के कुछ अंश हटाने का अनुरोध किया था. शीर्ष कोर्ट ने दो अगस्त को पुस्तकों पर प्रतिबंध के चलन की आलोचना करते हुए कहा था कि इससे विचारों का स्वतंत्र प्रवाह बाधित होती है. कोर्ट ने यह भी कहा था कि साहित्यिक कार्य उसी समय प्रतिबंधित किया जा सकता है, जब वह भारतीय दंड संहिता की धारा 292 जैसे किसी कानून का उल्लंघन करता हो. Also Read - Sushant Death Case: सुप्रीम कोर्ट में बिहार पुलिस ने कहा- मुंबई पुलिस दे रही रिया का साथ

राधाकृष्णन ने याचिका में आरोप लगाया था कि पुस्तक में मंदिरों में पूजा कराने वाले ब्राह्मणों के बारे में की गई चुनिंदा टिप्पणियां ‘जातीय आक्षेप’ जैसी हैं. इसमें यह भी आरोप लगाया गया था कि केरल सरकार ने इस पुस्तक का प्रकाशन, इसकी ऑन लाइन बिक्री और उपन्यास की उपलब्धता रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाए. केंद्र और राज्य सरकार दोनों ने ही पुस्तक पर प्रतिबंध के लिए दायर याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जाना चाहिए.