नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट अनुसूचित जाति मूल के दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों को मिलने वाले लाभ दिलाने के लिए दायर याचिका पर बुधवार को विचार के लिए सहमत हो गया. प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्य कांत की पीठ ने नेशनल काउन्सिल ऑफ दलित क्रिश्चियन्स की याचिका पर सुनवाई के बाद सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और भारत के महापंजीयक को नोटिस जारी किए.

शीर्ष अदालत ने सरकार को इस याचिका का दो सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश देते हुए इसे पहले से ही लंबित मामले के साथ संलग्न कर दिया. इस याचिका में दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने और अनुसूचित जातियों को क्षेत्र निरपेक्ष बनाने का अनुरोध किया गया है.

याचिका में कहा गया है कि हिंदू, सिख और बौध धर्म के अलावा दूसरे धर्म का पालन करने वाले अनूसूचित जाति का व्यक्ति को संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के तीसरे पैराग्राफ में प्रदत्त लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता है.

याचिका में कहा गया है कि संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 का तीसरा पैराग्राफ अनूसूचित जातियों के मूल वाले ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त करने से वंचित करता है. दलित ईसाइयों को इस तरह से अनुसूचित जाति के लाभों से वंचित करना संविधान में प्रदत्त समता, धार्मिक स्वतंत्रता और भेदभाव नहीं करने संबंधी मौलिक अधिकारों के खिलाफ है.