यह कल की ही घटना है, व्‍यभिचार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से एक दिन पहले. देश की राजधानी और देश के सबसे आधुनिक सोच वाले शहरों में शामिल नई दिल्‍ली के आजादपुर इलाके में एक व्‍यक्ति ने अपनी पत्‍नी की सिलिंडर से पीट कर हत्‍या कर दी. वजह- पति को शक था कि पत्‍नी के दूसरे पुरुष के साथ संबंध हैं. शक-सुबहा के आधार पर तलाक के हजारों मामले हमारे सामने हैं. ऐसे समाज में जहां दूसरे मर्द के साथ संबंध (अब इसे अवैध नहीं कह सकते) का शक हो जाए तो पति-पत्‍नी एक-दूसरे की हत्‍या करने तक पर उतारू हो जाते हैं, क्‍या वहां इस तरह के संबंधों को अवैध की श्रेणी से बाहर करना तार्किक है.

यहां सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले का नहीं है. देश की शीर्षस्‍थ अदालत ने जो फैसला दिया है, वह पूरी तरह तर्कसंगत है. विकसित सोच वाले देशों में ऐसा ही होता है. ग्‍लोबलाइजेशन को हमारी सरकार ने अपनाया है. सोशल ओपननेस इसकी एक स्‍वाभाविक परिणति है. सोशल ओपननेस यानी सामाजिक खुलापन…यानी ऐसा समाज जहां कोई पर्दा न हो. लोग खुलकर अपनी भावनाओं कर इजहार कर सकें, अपने संबंधों को स्‍वीकार कर सकें और अपने प्रतिकूल चीजों का प्रतिकार कर सकें- सीमित अर्थों में सामाजिक खुलेपन को कुछ इस तरह परिभाषित किया जा सकता है. देश में ग्‍लोबलाइजेशन की शुरुआत के बाद देश-विदेश की बातें अब सुदूर देहातों में भी आम लोगों की चर्चाओं का हिस्‍सा बन गए हैं, लेकिन पश्चिमी देशों की तरह सोशल ओपननेस अब भी हमारे लिए दूर की कौड़ी है.

आजादी के 72 साल बाद भी जो समाज जाति, धर्म और लिंग के आधार पर बंटा हुआ हो, उससे भला खुलेपन की क्‍या उम्‍मीद हो सकती है. जहां लोग घर के नौकर के बारे में भी आदतन झूठ बोलते हों, वे भला अपने विवाहेत्‍तर संबंधों को खुले रूप में कैसे स्‍वीकार कर पाएंगे. जी हां, भारत में बालश्रम वर्षों से प्रतिबंधित है. फिर भी देश के अधिकतर समृद्ध परिवारों में कम उम्र के बच्‍चों से घर का काम कराया जाता है, लेकिन पूछे जाने पर घर का हरेक सदस्‍य इससे इंकार कर देता है.

यहां सवाल एक पक्ष का भी नहीं है. सवाल यह भी है कि यदि कोई पुरुष खुले मन से अपने संबंधों को सार्वजनिक कर भी दे तो क्‍या समाज उसे स्‍वीकार कर पाएगा. क्‍या विवाह से बाहर के संबंधों को सामाजिक मान्‍यता मिल पाएगी. सवाल यहीं तक सीमित नहीं हैं. क्‍या यह समाज विवाह से इतर संबंध रखने वाली महिला को सम्‍मान दे पाएगा.

वैध-अवैध, ये कानून-कोर्ट की बातें हैं. असली सवाल तो सामाजिक स्‍वीकृति का ही है. भ्रष्‍टाचार को समाज में एक जगह मिली हुई है क्‍योंकि भ्रष्‍ट आचरण करने वाला पैसे के बल पर सामाजिक प्रतिष्‍ठा हासिल करने में कामयाब हो जाता है. लेकिन नैतिक भ्रष्‍टाचार भारतीय समाज के लिए अब भी टैबू है. जहां मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं समाज का नियमित हिस्‍सा हों, वहां सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला आजादपुर जैसी घटनाओं को कितना रोक पाएगा, कहना मुश्किल है.

 

(ये लेखक के व्‍यक्तिगत विचार हैं.)