तिरुवनंतपुरम: केरल के देवस्वओम मंत्री कडाकमपल्ली सुरेंद्रन ने सोमवार को कहा कि राज्य सरकार श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रशासन में त्रावणकोर के शाही परिवार के अधिकार को बरकरार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करती है और वह आदेश को लागू करेगी. Also Read - SSR Case: बिहार पुलिस ने पूछा, बिना FIR दर्ज किए मुंबई पुलिस जांच कैसे कर रही थी?

सुरेंद्रन ने मीडिया से कहा, ”राज्य सरकार शीर्ष अदालत के फैसले का स्वागत करती है. हम उच्चतम न्यायालय के फैसले पर गौर करेंगे. विस्तृत आदेश अभी नहीं आया है. हम उच्चतम न्यायालय के फैसले को लागू करेंगे.” उन्होंने कहा सरकार फैसले का सम्मान करती है. फैसले से खुश कुछ लोग मंदिर के पास मिठाइयां बांटते हुए नजर आए . Also Read - सुप्रीम कोर्ट का आदेश- प्रशांत भूषण के कोर्ट के अवमानना मामले में होगी सुनवाई,

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट का 31 जनवरी 2011 का वह आदेश सोमवार को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार से ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की पूंजी और प्रबंधन का नियंत्रण लेने के लिए न्यास गठित करने को कहा गया था. शीर्ष न्यायालय ने केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रशासन में त्रावणकोर शाही परिवार के अधिकारों को बरकरार रखा. फैसले का स्वागत करते हुए त्रावणकोर शाही परिवार ने कहा कि वे फैसले से खुश हैं. Also Read - ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रुजुएशन की अंतिम वर्ष की परीक्षाएं होंगी या नहीं? सुप्रीम कोर्ट आज करेगा फैसला

एक संदेश में शाही परिवार ने कहा, ”उच्चतम न्यायालय के आज के फैसले को हम पद्मनाभस्वामी का परिवार पर ही नहीं बल्कि सारे श्रद्धालुओं को मिले आशीर्वाद के तौर पर देखते हैं.” शाही परिवार से संबद्ध पूयम तिरुनल गोवरी पार्वती बाई ने कहा, ”हम प्रार्थना करते हैं कि सबको सुरक्षित रखने और सबकी भलाई के लिए उनकी निरंतर कृपा बनी रहे. मुश्किल वर्षों में साथ देने के लिए सबका शुक्रिया. भगवान आपका भला करे.’’

न्यायमूर्ति यू यू ललित की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अंतरिम कदम के तौर पर मंदिर के मामलों के प्रबंधन वाली प्रशासनिक समिति की अध्यक्षता तिरुवनंतपुरम के जिला न्यायाधीश करेंगे. शीर्ष अदालत ने इस मामले में उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. इनमें से एक याचिका त्रावणकोर शाही परिवार के कानूनी प्रतिनिधियों ने दायर की थी.

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर को देश के सबसे धनी मंदिरों में गिना जाता है. इस भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण 18वीं सदी में इसके मौजूदा स्वरूप में त्रावणकोर शाही परिवार ने कराया था, जिन्होंने 1947 में भारतीय संघ में विलय से पहले दक्षिणी केरल और उससे लगे तमिलनाडु के कुछ भागों पर शासन किया था.