
Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने वैवाहिक संबंधों और कानूनी सीमाओं के बीच एक स्पष्ट रेखा खींच दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति का अलग रही पत्नी से खर्चे का हिसाब मांगना क्रूरता नहीं है. बल्कि घर के आर्थिक प्रबंधन के लिए यह बेहद जरूरी है. लेकिन इसे क्रूरता के मामले तक खींचा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह भी कहा कि पति और पत्नी अपने स्वभावगत मुद्दें सुलझाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना बंद कर दें.
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में स्पष्ट कहा कि वैवाहिक जीवन में वित्तीय प्रबंधन (Financial Management) एक घरेलू हिस्सा है. अगर पति घर के खर्चों का लेखा-जोखा एक्सेल शीट में रखता है या पत्नी से हिसाब मांगता है, तो इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत ‘आपराधिक क्रूरता’ नहीं माना जा सकता. अदालत के अनुसार, वित्तीय नियंत्रण रखना या हिसाब मांगना भारतीय परिवारों की एक वास्तविकता हो सकती है, जो स्वभाव में कठोर हो सकती है, लेकिन जब तक इससे पत्नी को कोई गंभीर मानसिक या शारीरिक चोट न पहुंचे, यह अपराध की श्रेणी में नहीं आता.
क्रूरता के इस मामले में पत्नी ने आरोप लगाया था कि प्रेग्नेंसी के बाद वजन बढ़ने पर पति उसे ताने मारता था. इसे लेकर जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि पत्नी के वजन या लुक्स पर टिप्पणी करना एक असंवेदनशील और गलत व्यवहार (Insensitive Behavior) तो हो सकता है, लेकिन इसे आपराधिक क्रूरता (Criminal Cruelty) नहीं कहा जा सकता. हर बुरा व्यवहार अपराध नहीं होता. वहीं, कानून का उद्देश्य गंभीर प्रताड़ना को रोकना है, न कि पति-पत्नी के बीच के व्यक्तिगत स्वभावगत मतभेदों को सुलझाना.
IPC की धारा 498A को विवाहित महिलाओं को दहेज प्रताड़ना और ससुराल पक्ष के अत्याचार से बचाने के लिए बनाया गया था. इसमें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के लिए सजा का प्रावधान है. हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में चिंता जताई कि इस धारा का इस्तेमाल कई बार आपसी हिसाब-किताब चुकता करने या निजी दुश्मनी निकालने के लिए किया जा रहा है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में भावनात्मक और आर्थिक खींचतान हो सकती है, लेकिन हर विवाद को पुलिस और जेल तक ले जाना कानून की भावना के खिलाफ है. आपराधिक कानून तभी लागू होना चाहिए जब उत्पीड़न की सीमा मानवीय सहनशक्ति और सुरक्षा से परे हो जाए. बता दें कि अब यह धारा नई ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 85 में बदल चुकी है.
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें India Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.