नई दिल्ली: संसद में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पारित किए गए नागरिकता संशोधन कानून 2019 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं हैं. इन सभी याचिकाओं में कहा गया है कि नागरिकता कानून में संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे और समता के अधिकार सहित मौलिक अधिकारों का हनन करता है.

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा सहित कई याचिकाकर्ताओं ने शुक्रवार को नागरिकता संशोधन कानून की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर कीं.

नागरिकता संशोधित कानून
संशोधित नागरिकता कानून के मुताबिक, 31 दिसंबर, 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ्गानिस्तान से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के सदस्यों को अवैध शरणार्थी नही माना जाएगा और उन्हें भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी. राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने गुरुवार की रात नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को अपनी संस्तुति दी और इसके साथ ही यह विधेयक कानून बन गया.

टीएमसी और कांग्रेस सांसद ने दायर की याचिकाएं
चीफ जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के समक्ष शुक्रवर को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका सुनवाई के लिए आज या 16 दिसंबर को सूचीबद्ध करने के लिए उल्लेख किया गया. पीठ ने कहा, आज? आज कुछ नहीं. आप शीघ्र सुनवाई के उल्लेख के लिए निर्धारित अधिकारी के पास जाएं.

इन्‍होंने भी दायर कीं याचिकाएं
– इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग
– ऑल असम स्टूडेन्ट्स यूनियन
– पीस पार्टी
– गैर सरकारी संगठन ‘रिहाई मंच’
– सिटीजन्स अगेन्स्ट हेट
– अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा
– कानून के कई

टीएमसी एमपी महुआ मोइत्रा ने कही ये बात
यह कानून को ‘सरासर असंवैधानिक’ है
– यह भारत के धर्मनिरपेक्षता के बहुलता, बहुधर्मी और सर्वधर्म सम्भाव की बुनियाद को नष्ट करता है
– यह संशोधित कानून को विघटनकारी, लोगों को अलग करने वाला और पक्षपात करने वाला है
-इससे देश का धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को अपूर्णीय नुकसान होगा
– यह विशेष धर्मो के अवैध शरणार्थियों को तत्काल नागरिकता हासिल करने की अनुमति देता है
– याचिका का निबटारा होने तक इस कानून के अमल और इसके तहत सभी कार्रवाईयों पर रोक लगाई जाए

कांग्रेस सांसद रमेश ने याचिका में कहीं ये बातें
– इस कानून ने न्यायलाय के विचार के लिए अनेक कानूनी सवालों को जन्म दिया है
– क्या भारत में नागरिकता प्राप्त करने या इससे इनकार करने के लिए धर्म एक पहलू हो सकता है
– नागरिकता कानून में संशोधन को पूरी तरह असंवैधानिक
– यह कानून संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों की बुनियाद पर हमला है
– यह समानता को असमान बनाने वाला है

इस कानून के अमल के खिलाफ
इस याचिका में नागरिकता संशोधन विधेयक और विदेशी नागरिक संशोधन (आदेश) 2015 और पासपोर्ट (नियमों में प्रवेश),
संशोधन नियम 2015 के अमल पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध किया गया है.

याचिका में आरोप, संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है यह कानून
-यह विधेयक संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है
– इसका स्पष्ट मकसद मुसलमानों के साथ भेदभाव करना है
– प्रस्तावित कानून का लाभ सिर्फ हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के सदस्यों को ही मिलेगा.

धर्म के आधार पर भेदभाव और अनुचित वर्गीकरण
याचिकाकर्ताओं को शरणार्थियों को नागरिकता दिए जाने के बारे में कोई शिकायत नहीं है
– लेकिन धर्म के आधार पर भेदभाव और अनुचित वर्गीकरण को लेकर है

याचिका में ये तर्क
-गैरकानूनी शरणार्थी अपने आप में ही एक वर्ग है और इसलिए उनके धर्म, जाति या राष्ट्रीयता के आधार के बगैर ही उन पर कोई कानून लागू किया जाना चाहिए

सरकार पर आरोप
– सरकार ने अहमदिया, शिया और हजारा जैसे अल्पसंख्यकों को इस विधेयक से बाहर रखने के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है
– इन अल्पसंख्यकों का लंबे समय से अफगानिस्तान और पाकिस्तान में उत्पीड़न हो रहा है