नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रपति शासन का विरोध करती है. इस साल जून में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष पर गृह मंत्री अमित शाह ने इस संदर्भ में आरोप लगाते हुए कहा था कि लोकतंत्र का गला घोटने का कार्य कांग्रेस ने किया है. उन्होंने कहा था, “मैं यह कहना चाहूंगा कि देश में अब तक 132 उदाहरण ऐसे हैं, जब संविधान के अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन लगाने का आदेश) का इस्तेमाल किया गया और इनमें से 93 मौकों पर केंद्र में कांग्रेस की सरकार का शासन था.” लेकिन, यह पहली बार नहीं है जब भाजपा के शासन में किसी राज्य (महाराष्ट्र) में राष्ट्रपति शासन लगने जा रहा है.

हाल ही में जिस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा वह जम्मू एवं कश्मीर था. तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस्तीफे के बाद भाजपा ने पीडीपी के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तब यहां जून 2018 में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जिसके बाद के घटनाक्रम में अनुच्छेद 370 को रद्द कर दिया गया और प्रदेश से विशेष राज्य का दर्जा भी वापस ले लिया गया. इससे पहले 2015 में, विधानसभा चुनावों में एक खंडित फैसले के बाद सरकार गठन में विफलता के चलते जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय शासन राज्य में लागू किया गया था.

अरुणाचल प्रदेश वर्ष 2016 में 26 दिनों के राष्ट्रपति शासन का गवाह बना. कांग्रेस के 21 विधायकों ने 11 भाजपा और दो निर्दलीय विधायकों के साथ हाथ मिलाया, जिससे सरकार अल्पमत में आ गई. हालांकि, मामले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी गई थी और न्यायालय ने अपने फैसले में कांग्रेस सरकार को बहाल कर दिया था. पर्वतीय राज्य उत्तराखंड ने वर्ष 2016 में दो बार राष्ट्रपति शासन देखा. पहले 25 दिन और बाद में 19 दिनों के लिए. पहले कांग्रेस में फूट पड़ने के बाद और दूसरी बार मई में एक बार फिर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ.

महाराष्ट्र में 2014 में 33 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन रहा था. इस वर्ष चुनाव होने से ठीक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने राज्य में 15 वर्षीय कांग्रेस-राकंपा गठबंधन के टूटने के बाद इस्तीफा दे दिया, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति शासन लगा.

(इनपुट आईएएनएस)