नई दिल्ली: सड़कों पर रेड लाइट होने के दौरान सामान बेचने या भीख मांगने वाले बच्चे कहां से आते हैं? इन बच्चों की पहचान क्या है? राजधानी में हर साल हजारों बच्चे तस्करी का शिकार होते हैं. एक हैरतंगेज हालिया रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी में लापता होने वाले प्रत्येक दस में से छह बच्चों का कभी पता ही नहीं चलता.

CRY की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
अलायंस फॉर पीपुल्स राइट्स (एपीआर) और गैर सरकारी संगठन चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राइ) द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में ये चौंकाने वाले तथ्य प्रकाश में आए हैं. ‘दिल्ली में लापता बच्चे 2018’ के मुताबिक, पिछले पांच साल में दिल्ली में 26,761 बच्चे लापता हो गए. इनमें से 9,727 बच्चों का ही पता चल सका. राष्ट्रीय राजधानी में लापता होने वाले हर दस बच्चों में छह का पता नहीं चल पाता है. क्राइ की क्षेत्रीय निदेशक (उत्तर) सोहा मोइत्रा ने कहा कि बच्चों का पुनर्वास करना एक बड़ी चुनौती है.

उन्होंने कहा, अगर बहुत छोटी उम्र में बच्चों की तस्करी हुई हो तो ऐसे बच्चों का पता लगाने में ज्यादा समय लगता है और इस वजह से उन्हें अपने घर के बारे में भी याद नहीं होता. चेहरा पहचानने वाली अद्यतन तकनीक पर काम चल रहा है और पुलिस आश्वस्त है कि बेहद छोटी उम्र में तस्करी के शिकार होने वाले बच्चों के पुनर्वास में इससे मदद मिलेगी.

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राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों और पुलिस से सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाब के आधार पर रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में 63 प्रतिशत लापता बच्चों का पता नहीं चल पता है. यह आंकड़ा बाकी देश के 30 प्रतिशत आंकड़े से दोगुना है. बच्चों के लापता होने में ऐसे गिरोहों का हाथ होने की आशंका है जिनके तार कई राज्यों से जुड़े हैं.

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दिल्ली के मयूर विहार के एक ट्रैफिक सिग्नल पर रोजी-रोटी के लिए फूल बेचने वाले मनोज ने कहा, ‘गिरोह के लोग कुछ दूरी से इन सिग्नलों पर ऐसे बच्चों पर नजर रखते हैं और जब पुलिस उन्हें बचाने के लिए आती है तो दावा करते हैं कि वे सभी उनके बच्चे हैं.’ मनोज ने कहा कि इनमें से कई बच्चों को दूसरे राज्यों से तस्करी कर लाया जाता है और ट्रैफिक सिग्नल पर जो महिलाएं होती हैं, वो ऐसे जाहिर करती हैं कि वो इन बच्चों के अभिभावक हैं. (भाषा इनपुट)