नई दिल्ली: कम बारिश को लेकर उद्योग और कृषि जगत की चिंताओं के बीच मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर अब तक बारिश की पर्याप्त मात्रा दर्ज की गठ्र है, लेकिन मानसून के असमान वितरण के कारण बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में जहां बारिश की कमी है, उनमें अगले सप्ताह इसकी क्षतिपूर्ति होने की उम्मीद है. मानसून के उतार चढ़ाव भरे मिजाज पर महापात्रा से पांच सवाल और उनके जवाब:

  1. सवाल: दक्षिण पश्चिम मानसून के तीन महीने बीतने के बावजूद अब तक मैदानी इलाके बारिश की कमी और उमस भरी गर्मी से जूझ रहे हैं. क्या इसे मानसून की कमी का नतीजा माना जाए?

जवाब: इस साल मानसून की अब तक की बारिश को कमी के रूप में नहीं देखा जा सकता है. पूरे देश में बारिश की मात्रा पूर्वानुमान के मुताबिक ही दर्ज की गयी है. यह सही है कि दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित अन्य राज्यों के कुछ इलाके फिलहाल बारिश की कमी के दायरे में हैं. इसकी वजह मानसून का असमान वितरण है, मानसून की कमी नहीं. मानसून के असमान वितरण के कारण कुछ क्षेत्रों में उमस भरी गर्मी भी महसूस की जा रही है. लेकिन वातावरण में मौजूद नमी के कारण हवा के कम दबाव का क्षेत्र बन गया है जिसके चलते अगले सप्ताह इन क्षेत्रों में बारिश का दौर देखने को मिलने का अनुमान है.

2 सवाल : देश के लगभग 250 जिले बारिश की कमी के दायरे में हैं. ऐसे में मानसून की अब तक की बारिश को पर्याप्त कैसे माना जा सकता है?

जवाब: इस साल मानसून में एक जून से छह सितंबर तक राष्ट्रीय स्तर पर 762.5 मिमी बारिश दर्ज की गई है. जबकि इसका अनुमानित सामान्य स्तर 751.5 मिमी था. स्पष्ट है कि समूचे देश को राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य से अधिक बारिश मिली है. इसके उलट अगर राज्य और जिलों के स्तर पर मानसून के वितरण के आंकड़ें देखें तो देश के 9 राज्यों में अब तक सामान्य से अधिक, 19 राज्यों में सामान्य और 9 राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है. सिर्फ एक राज्य (मणिपुर) में सामान्य से बहुत कम बारिश दर्ज हुई है. मानसून की शेष अवधि में इसकी गति को देखते हुये अभी तक की कमी वाले इलाकों में बारिश की भरपाई के लिये हम आश्वस्त हैं.

3 सवाल : बारिश की कमी वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे कृषि आधारित बड़े राज्य और अधिक बारिश के लिए मशहूर राज्य, मेघालय और नगालैंड का शामिल होना क्या मानसून के बदलते मिजाज का सूचक नहीं है?

जवाब: यह मानसून के बदलते मिजाज का नतीजा कतई नहीं है. यह मानसून के असमान वितरण का नतीजा माना जा सकता है. यह मानसून की सामान्य प्रकृति का हिस्सा है. इस साल जिन इलाकों में अब तक बारिश की कमी दिख रही है, पिछले साल उन इलाकों में पर्याप्त बारिश हुई थी. जबकि पिछले साल मानसून के शुरुआती दौर में बारिश की कमी वाले इलाकों में मानसून के अंतिम दौर में बारिश की कमी की भरपाई हो गई थी. इसी प्रकार इस साल भी होने का अनुमान है. इसलिए मानसून की गति के नजरिये से इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है, ना ही कोई चिंता की बात है.

4. सवाल: मानसून की सामान्यत: 30 सितंबर तक वापसी शुरू हो जाती है, इस अवधि में मानसून का मिजाज कैसा रहने का अनुमान है?

जवाब: जैसा मैंने पहले ही बताया कि ओडिशा के उत्तरी तटीय इलाकों और पश्चिम बंगाल के आसपास हवा के कम दबाव का क्षेत्र बन गया है. इसके फलस्वरूप मानसून अगले दो तीन दिन तक राजस्थान में बीकानेर और कोटा, मध्य प्रदेश में गुना और दमोह एवं छत्तीसगढ़ में पेंडरा रोड एवं झारसुगुडा से गुजरेगा. इन इलाकों में बारिश की भरपाई करते हुए 11 से 13 सितंबर के बीच पूर्वोत्तर राज्यों, पूर्वी एवं पश्चिमी तटीय इलाकों के अलावा मध्य भारत में तेज बारिश का पूर्वानुमान है, जिससे मेघालय और नगालैंड सहित बारिश की अब तक कमी वाले इलाकों में इसकी भरपाई हो सकेगी. अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि मानसून की वापसी 30 सितंबर से शुरू हो जाएगी. भूलना नहीं चाहिए कि पिछले साल भी मानसून की देर से वापसी हुई थी.

5. सवाल: साल दर साल मानसून के असमान वितरण की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए वर्षा जल प्रबंधन के लिए मौसम विभाग की क्या तैयारियां हैं?

जवाब: अत्याधुनिक तकनीक द्वारा मौसम विभाग बारिश के सटीक पूर्वानुमान की मदद से जल प्रबंधन से जुड़ी सभी एजेंसियों और शासन प्रशासन के समूचे तंत्र को जोड़ने की कार्ययोजना को तत्परता से लागू कर रहा है. इसका लक्ष्य अगले पांच साल में सभी संबद्ध एजेंसियों से जल प्रबंधन के सभी संभावित आंकड़े जुटा कर बारिश की हर बूंद को व्यर्थ होने से बचाना है. पिछले कुछ सालों में मानसून के असमान वितरण को देखते हुए वर्षा जल प्रबंधन ही जलसंकट से बचने का एकमात्र उपाय है. इसके लिए‘फ्लैश फ्लड वार्निंग सिस्टम’ तकनीक के तहत बारिश जनित बाढ़ में पानी की बर्बादी को रोकने का सफल पायलट प्रयोग चल रहा है. इसके अगले चरण में मानसून की बारिश के किसी क्षेत्र विशेष में पड़ने वाले संभावित असर से स्थानीय प्रशासन को अवगत कराने का पायलट प्रयोग भी गत गुरुवार से शुरू कर दिया गया है. अगले पांच साल में सभी जिलों के लगभग 7000 ब्लॉक को इस तकनीक से जोड़ दिया जाएगा.