मुंबई: केद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) की एक विशेष अदालत राजनीतिक रूप से संवेदनशील सोहराबुद्दीन अनवर शेख और तुलसीराम प्रजापति दोहरे मुठभेड़ मामले में और गुजरात के कौसर बी दुष्कर्म व हत्या मामले में फैसला 21 दिसंबर को सुनाएगी. इस बहुचर्चित मामले में अंतिम बहस तीन दिसंबर को शुरू हुई थी, जो सीबीआई के विशेष न्यायाधीश एस जे शर्मा के समक्ष पांच दिसंबर को समाप्त हुई.

राजनीतिक भूचाल लाने वाली मुठभेड़
वर्ष 2005-06 के दौरान कथित गैंगस्टर सोहराबुद्दीन और प्रजापति को ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे जाने और सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी की गुमशुदगी ने देश में बड़े पैमाने पर राजनीतिक भूचाल ला दिया था.
अभियोजन पक्ष की दलील थी कि सोहराबुद्दीन का संबंध आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से था और वह कथित रूप से एक महत्वपूर्ण नेता (संभवत: तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) की हत्या की साजिश रच रहा था.

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गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख से जुड़े कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में पूर्व में हुई बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने कहा था कि यह मामला ‘‘राजनीति से प्रेरित’’ था इसे सीबीआई ने गढ़ा था और एजेंसी अब ‘‘काफी संतुलित’’ है. इस मामले में आरोप मुक्त किए गए लोगों में से एक आईपीएस अधिकारी राजकुमार पांडियान की ओर से पेश जेठमलानी ने कहा कि कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए सोहराबुद्दीन और उसका साथी तुलसीराम प्रजापति कुख्यात गैंगस्टर थे और तीन राज्यों की पुलिस को उनकी तलाश थी.

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जबकि बचाव पक्ष का कहना है कि सोहराबुद्दीन शेख एक मामूली अपराधी था जिसका आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं था. उसे गुजरात के गांधीनगर में गुजरात पुलिस ने नवंबर, 2005 में मुठभेड़ में मार दिया था. पुलिस ने सोहराबुद्दीन शेख को आतंकवादी ठहराया बाद में खुलासा हुआ कि इस मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन शेख की पत्नी कौसर बी भी मारी गई थी. घटना के समय सोहराबुद्दीन व कौसर बी के साथ मौजूद तुलसीराम प्रजापति जो इस वारदात का मुख्य गवाह भी था उसकी भी एक साल बाद सनसनीखेज ढंग से हत्या हो गई थी.

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2014 में 16 लोगों को कोर्ट ने किया था बरी
जांचकर्ताओं का कहना है कि यह हत्याएं उन लोगों को चुप कराने के लिए की गई थीं जो तीन राज्यों क्रमशः  गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश की पुलिस अपने राजनैतिक आकाओं के इशारे पर चला रही थी. मामले में कुल 37 लोगों को आरोपी बनाया गया था. लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी नए-नए तथ्यों का खुलासा हुआ और वर्ष 2014 में इस केस से 16 लोगों को आरोप मुक्त करार देते हुए बरी कर दिया गया. बरी किए गए लोगों में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री और अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, राजस्थान के तत्कालीन गृहमंत्री जी सी कटारिया, गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक डी जी बंजारा, आईपीएस अधिकारी एन के अमीन और 12 अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे. सर्वोच्च न्यायालय के सितंबर 2012 के एक आदेश के तहत मामले को गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया था. (इनपुट एजेंसी)