
Gaurav Barar
गौरव बरार (Gaurav Barar) एक अनुभवी पत्रकार और कंटेंट विशेषज्ञ हैं जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में, इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर अपनी सेवाएं ... और पढ़ें
Somnath Temple History: भारतीय इतिहास के पन्नों में सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों से निर्मित एक देवालय नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की अमरता और सनातन संस्कृति के स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है. गुजरात के प्रभास पाटन के समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम और सर्वाधिक पूजनीय माना जाता है.
सोमनाथ का इतिहास विनाश और सृजन की एक ऐसी अनवरत यात्रा है, जो यह सिद्ध करती है कि हमलावर मंदिरों की दीवारें तो ढहा सकते हैं, लेकिन भक्तों के हृदय में बसी आस्था के साम्राज्य को कभी पराजित नहीं कर सकते.
आज जब पूरा भारतवर्ष ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मना रहा है, तो यह अवसर केवल एक ऐतिहासिक घटना को याद करने का नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना को नमन करने का है जिसने वर्षों के दमन के बाद भी खुद को सुरक्षित रखा.
सोमनाथ की त्रासदी का सबसे काला अध्याय 11वीं शताब्दी में शुरू हुआ. गजनी का शासक महमूद गजनवी, जो अपने पिता सुबुकतिगीन की मृत्यु के बाद अपने भाई को कैद कर सत्ता पर काबिज हुआ था, एक कट्टर और लालची आक्रांता था. इतिहासकारों के अनुसार, गजनवी के भारत पर 17 आक्रमणों के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य थे- पहला, इस्लामी कट्टरपंथ के तहत मंदिरों का विध्वंस कर अपनी धार्मिक विजय सिद्ध करना, और दूसर, भारत के मंदिरों में जमा अपार स्वर्ण संपदा को लूटना.
अक्टूबर 1024 में गजनवी 30 हजार घुड़सवारों के साथ गजनी से निकला. जनवरी 1026 में जब वह सोमनाथ पहुंचा, तो वहां का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था. मंदिर की रक्षा के लिए स्थानीय ब्राह्मणों, निहत्थे शिवभक्तों और योद्धाओं ने दीवार बनकर मुकाबला किया. 8 जनवरी 1026 को जब गजनवी की सेना ने किले में प्रवेश किया, तो वहां एक भयानक नरसंहार हुआ.
अपनी आस्था की रक्षा करते हुए लगभग 50 से 70 हजार शिवभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी. गजनवी ने न केवल ज्योतिर्लिंग को खंडित किया, बल्कि मंदिर के 56 नक्काशीदार खंभों को तोड़ दिया और वहां से लगभग 60 क्विंटल सोना, चांदी और बहुमूल्य रत्न लूटकर ले गया.
सोमनाथ पर हुआ वह हमला केवल एक शुरुआत थी. आने वाली शताब्दियों में यह मंदिर मुस्लिम आक्रांताओं के निशाने पर बना रहा. 1299 में अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं ने इसे फिर से ध्वस्त किया. 1395 और 1412 में जफर खान और अहमद शाह ने इसे क्षति पहुंचाई. 1665 और अंततः 1706 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर वहां मस्जिद बनाने का प्रयास किया.
इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर पर 17 बार हमला हुआ और मुगलों ने इसे लूटा था. इन हमलों का उद्देश्य स्पष्ट था, भारतीयों के मनोबल को तोड़ना और उनकी सांस्कृतिक जड़ों को उखाड़ फेंकना. हालांकि नियति को कुछ और ही मंजूर था. सोमनाथ पर कुदृष्टि डालने वाले शासक और उनके साम्राज्य काल के गाल में समा गए, लेकिन महादेव का यह निवास स्थान हर बार राख से उठकर फिर खड़ा हुआ.
सदियों के अपमान का कलंक मिटाने का अवसर भारत की स्वतंत्रता के साथ आया. आजादी के तुरंत बाद, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने खंडहर हो चुके सोमनाथ को देखा और संकल्प लिया कि इसका पुनर्निर्माण किया जाएगा. उन्होंने इसे केवल एक धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मसम्मान की बहाली माना. उनके निधन के बाद कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने इस मिशन को आगे बढ़ाया.
11 मई 1951 का दिन आधुनिक भारत के इतिहास में दर्ज हो गया, जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भव्य सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया. हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रतिनिधियों को ऐसे धार्मिक कार्यों से दूर रहना चाहिए. हालांकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि सोमनाथ का पुनरुद्धार केवल एक पूजा स्थल का निर्माण नहीं, बल्कि विदेशी दासता के प्रतीकों को मिटाकर भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का उत्सव है.
वर्तमान में सोमनाथ मंदिर ‘कैलाश महामेरु’ प्रासाद शैली में निर्मित एक भव्य ढांचा है, जो अपनी स्थापत्य कला से पूरी दुनिया को आकर्षित करता है. मंदिर के प्रांगण में स्थित बाण स्तंभ यह बताता है कि सोमनाथ से लेकर दक्षिण ध्रुव के बीच कोई भी भूमि का टुकड़ा नहीं है, जो प्राचीन भारतीय भूगोल और विज्ञान की सूक्ष्मता का प्रमाण है.
सोमनाथ मंदिर आज हमें तीन महत्वपूर्ण पाठ सिखाता है. संसाधन कम होने के बावजूद पूर्वजों ने जिस तरह आक्रांताओं का सामना किया, वह आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा है. यह मंदिर उत्तर से दक्षिण तक समस्त भारतीयों को एक सूत्र में पिरोता है. यह सिद्ध करता है कि अधर्म और विनाश की शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंततः जीत सत्य और आस्था की ही होती है. सोमनाथ मंदिर की लहरें आज भी यही गाथा सुनाती हैं कि विनाश हार गया और विश्वास जीत गया.
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