नई दिल्‍ली: 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए उत्‍तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन नई खबर नहीं है. इसकी औपचारिक घोषणा भले शनिवार को की गई हो, लेकिन करीब एक सप्‍ताह पहले ही दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे का मसला भी सुलझ चुका था. कांग्रेस को गठबंधन से बाहर रखने की बात भी पहले ही सामने आ चुकी थी. फिर भी, शनिवार दोपहर 12 बजे मायावती और अखिलेश यादव के प्रेस कॉन्‍फ्रेंस का नजारा देखकर लगा कि केवल उत्‍तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति बदल रही है. इसका संकेत इन दोनों नेताओं के बयानों से तो मिला ही, बाकी कसर प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के दौरान और लखनऊ के अलग-अलग हिस्‍सों में लगे बैनर-पोस्‍टरों ने पूरी कर दी.

प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के लिए लगे बैनरों में मायावती और अखिलेश यादव की लगी तस्‍वीरों में कुछ खास नहीं था. उन्‍हें तो होना ही था. भीमराव आंबेडकर और राममनोहर लोहिया की तस्‍वीरें भी उम्‍मीदों के अनुरूप ही थीं, लेकिन ध्‍यान खींचा उन लोगों ने जिनकी तस्‍वीरें कहीं नजर नहीं आईं. पिछले तीन दशक से यूपी की राजनीति के दो सबसे बड़े चेहरे इन पोस्‍टरों से गायब थे. इस दौरान राज्‍य में हर राजनीतिक घटना के केंद्र में वे रहे. राज्‍य में अपने राजनीतिक रसूख के बूते समय-समय पर राष्‍ट्रीय राजनीति में भी दखल देते रहे, लेकिन शनिवार को मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की गैरमौजूदगी ने यह तस्‍दीक कर दी कि राजनीति का स्‍वरूप अब बदल रहा है. इन पोस्‍टर और बैनरों ने एक बार फिर से यह भी साबित कर दिया कि राजनीति में दोस्‍ती और दुश्‍मनी वास्‍तव में स्‍थायी नहीं होती. अखिलेश ने अपने पिता ही नहीं, चाचा शिवपाल सिंह यादव को भी भाव देने से इंकार कर दिया क्‍योंकि मायावती को अब भी संभवत: सपा की पुरानी पीढ़ी के नेताओं पर भरोसा नहीं है.

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सपा-बसपा के बीच इससे पहले भी गठबंधन हो चुका है. 1993 में बसपा के सहयोग से सपा ने सरकार बनाई थी, लेकिन इसके बाद 1995 में गेस्‍ट हाउस कांड हुआ जिसने 25 वर्षों तक दोनों पार्टियों को एक दूसरे से दूर रखा. उत्‍तर प्रदेश के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो यह स्‍पष्‍ट है कि सपा-बसपा एक साथ आए तो दूसरी पार्टियों के लिए मुकाबले में टिकना मुश्किल होगा. लेकिन दोनों में से कोई भी पार्टी इसके लिए तैयार नहीं थीं. कांशीराम की मौत के बाद मायावती भी मुलायम सिंह यादव के करीब आने को तैयार नहीं थीं. दोनों पार्टियों के बीच संबंध गेस्‍ट हाउस कांड की छाया से उबर नहीं पाए थे. समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी का दावा करने वाली ये दोनों पार्टियां नजदीकियां बढ़ाना तो दूर, एक दूसरे को अपना दुश्‍मन मानती थीं.

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दोनों पार्टियों के बीच की इस खाई को बढ़ाने में दूसरी पार्टियों ने भी खूब योगदान दिया. जब भी सपा और बसपा के बीच नजदीकियों की चर्चा होती, भाजपा और कांग्रेस उन्‍हें गेस्‍ट हाउस कांड की याद दिलाने लगते थे. इसके पीछे दरअसल उनका अपना डर था. उन्‍हें लगता था कि इनके साथ आने से बाकी पार्टियों के लिए राज्‍य में राजनीतिक जमीन सिकुड जाएगी.

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इस खाई को पाटने की शुरुआत अखिलेश यादव ने राज्‍य में हुए पिछले विधानसभा चुनावों के बाद की. मायावती ने टालने की कोशिश की, लेकिन अखिलेश लगे रहे. इस समय तक वे समाजवादी पार्टी पर पूरी तरह अपना नियंत्रण स्‍थापित कर चुके थे. पिता मुलायम सिंह सपा के संरक्षक भले हैं, लेकिन सारे फैसले अब अखिलेश ही लेते हैं. उन्‍होंने यही बात मायावती को समझाने की कोशिश की. अखिलेश ने मायावती को यह विश्‍वास दिलाया कि गेस्‍ट हाउस कांड एक राजनीतिक भूल थी जिसका खामियाजा दोनों पार्टियों को उठाना पड़ा. मायावती ने थोड़ा समय लिया जो सही भी था कयोंकि इस कांड में सबसे ज्‍यादा छीछालेदार उनकी ही हुई थी.

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अखिलेश के ये प्रयास पहली बार तक सफल हुए जब पिछले साल फूलपुर और गोरखपुर के लिए हुए लोकसभा चुनावों में सपा-बसपा के बीच सहमति बनी. इसके नतीजे अच्‍छे रहे तो कारवां आगे बढ़ा. मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ और राजस्‍थान के विधानसभा चुनावों से होते हुए अब 2019 के लोकसभा चुनाव एक साथ लड़ने की घोषणा कर सपा-बसपा ने जता दिया है कि राज्‍य की राजनीति में अब उन्‍हें हाशिये पर डालना किसी के लिए आसान नहीं होगा. इससे भी ज्‍यादा पोस्‍टरों में मुलायम सिंह और कांशीराम के तस्‍वीरों की गैरमौजूदगी बताती है कि उत्‍तर प्रदेश की राजनीति अब पूरी तरह बदल चुकी है. गेस्‍ट हाउस कांड अब इतिहास के पन्‍नों तक सीमित है और उसके नायक-खलनायक भी अब किनारे हैं. इतना ही नहीं, यह दोनों पार्टियों में नए राजनीतिक नेतृत्‍व की परिपक्‍वता का भी संकेत है. यदि यह परिपक्‍वता आगे भी दिखी तो बुआ-बबुआ मिलकर देश की राजनीति बदलने का माद्दा भी रखते हैं.