माना की ‘गाय’ को हम अपनी मां के समान मानते हैं. गाय के प्रति भावनात्मक रुप से जुड़े हुए हैं. लेकिन क्या किसी को डरा-धमकाकर, मौत की घाट उतारकर ही उसे गाय के प्रति लगाव को समझाया जा सकता है. नहीं ये गलत है. ये गो-रक्षक भी नहीं. ऐसे लोग गो-रक्षक के नाम पर सिर्फ अपनी भड़ास निकाल रहे हैं. ये भी हो सकता है कि उन्हें इस मामले से कोई लेना देना भी न हो. कुछ लोग सिर्फ अपना हाथ साफ करने के लिए भी ऐसे समूह में शामिल हो जाते हैं. ऐसे लोगों का काम सिर्फ सांप्रदायिक दंगे भड़काना होता है. लोगों को झगड़े के लिए उकसाना होता है. अशांति फैलाना होता है. ऐसे लोगों का न तो देशभक्ती से कोई लेना देना होता है न ही किसी पशु प्रेम से. उनका काम तो आपस में लड़ते- झगड़ते लोगों को देखकर मजे लेना होता है.

photo- indiamike.com
अब कल ही बात लीजिए, मेट्रो में सफर करते वक्त किसी को शक हुआ कि साथ खड़े आदमी ने किसी की जेब से पैसे निकाले हैं. जैसे ही ये भनक लोगों को लगी सबने उसे पकड़कर पीटना शुरु कर दिया. वो तथाकथित ‘चोर’ बार-बार कह रहा था मेरी चैकिंग कर लो. अगर पैसे निकल जाए तो जो मर्जी करना. मुझसे भी रहा नहीं गया. मैंने कहा, अगर चोरी का शक है तो इसे पुलिस के हवाले कर दो. खुद क्यों यहां कानूनची बन रहे हो. तभी देखा मेट्रो की दूसरी बोगी से एक आदमी भीड़ को चीरता हुआ आया और आते ही चोर को तड़ातड़ थप्पड़ मारने लगा. मैंने उसे कहा, तुम इसे मार रहे हो. तुम्हें कैसे पता ये चोर है. तुम तो इस डिब्बे में भी नहीं थे. उसने जवाब दिया, मैडम आपको नहीं पता. ये चोर ही है. मैं ऐसे लोगों को खूब पहचानता हूं. पुलिस को देने से क्या होगा. पुलिस कुछ नहीं करती. हालांकि मेरी तेज आवाज के आगे उसका हाथ रुक गया. क्योंकि मुझे लगा अगर ये चोर है तो पुलिस निपटेगी. लेकिन अगर चोर न हुआ तो. अगर हमारा शक गलत निकला तो. तब क्या होगा. एक बेकसूर बेवजह भीड़ का निवाला बन जाएगा. इस कहानी को बताने का मेरा मकसद सिर्फ इतना ही है कि दूसरी बोगी वाले को पता चल गया कि फलाना बोगी में चोर है. और बिना कुछ और जाने भागता हुआ आया और उस चोर को बुरी तरह पीटने लगा. ये तथाकथित गो-रक्षक भी ऐसे ही हैं. इनका मकसद सिर्फ मामले की संजीदगी का फायदा उठाकर लोगों को उकसाना और गो-रक्षक बनकर उनके दामन में दाग लगाना है और कुछ नहीं.

बात जुनैद की हो, मोहम्मद आयूब पंडित की या फिर मोहम्मद अलीमुद्दीन की. हम किसी को एक नाम की आड़ में कैसे मार सकते हैं. ना हमारा धर्म इसकी इजाजत देता है. न गो-रक्षकी की सही परिभाषा. एक बार किसी को मारने से पहले कल्पना कर लीजिए. भीड़ आपको घेर ले. ताबड़तोड़ मारने लगे. मार-मारकर अधमरा कर दें. कितनी बैचेनी होगी अपनी सांस बचाने के लिए. शायद इसलिए, क्योंकि घर में कमाने वाले आप एक ही हो. बूढ़ी मां का सहारा हों. बीवी घर आने की राह देखती हो. बच्चा लपककर गोद में चढ़कर जाता हो. कितनी सारी चीजें घूमने लगती होंगी न उस वक्त जब आपको लगता होगा. अब तो भीड़ से बच नहीं पाएंगे. मर ही जाएंगे. उसके बाद परिवार का क्या होगा. घर खर्च कैसे चलेगा. अगर आप एक बार ये सोच लें तो यकीं मानिए हाथ कांप उठेंगे. मार नहीं पाएंगे.

फाइल फोटो
इंसान को मौत की घाट उतारने वाले लोग कभी भी गो-रक्षक नहीं हो सकते. कुछ भी कहने या सोचने से पहले एक बार पीएम मोदी के जीवन की ये घटना भी पढ़ लीजिए. ‘जब मैं छोटा था तो हमारे घर के पास एक परिवार रहता था. उस परिवार में कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण काफी तनाव का माहौल रहता था. काफी समय बाद उस घर में एक संतान का जन्म हुआ. उस समय एक गाय वहां पर आती थी और रोजाना कुछ खाकर जाती थी. एक बार गाय के पैर के नीचे बच्चा आ गया था, और उसकी मौत हो गई. दूसरे दिन सुबह ही वह गाय उनके घर के सामने खड़ी हो गई, उसने किसी के घर के सामने रोटी नहीं खाई. उस परिवार से भी रोटी नहीं खाई. गाय के आंसू लगातार बह रहे थे. वह गाय कई दिनों तक कुछ नहीं खा-पी सकी. पूरे मोहल्ले के लोगों ने काफी कोशिश की लेकिन गाय ने कुछ नहीं खाया और बाद में अपना शरीर त्याग दिया. एक बच्चे की मौत के पश्चाताप में उस गाय ने ऐसा किया, लेकिन आज लोग गाय के नाम पर ही हत्या कर रहे हैं.’

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यकीन मानिए ये पगलाई भीड़ गो-रक्षकों का हिस्सा नहीं हो सकती. क्योंकी जो व्यक्ति सेवा, प्यार, में विश्वास रखता है वो किसी को मार नहीं सकता. ये समझना दोनों पक्षों के लिए जरूरी है. उनके लिए जो ‘गाय’ के लिए इंसान को मार देते हैं उनके लिए भी है जो इंसान होकर एक ‘गाय’ को मार देते हैं जिसे एक धर्म में मां की तरह पूजा जाता है.
नोट: (लेखिका के निजी विचार हैं, इंडिया.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता)
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