नई दिल्ली: केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय से कोहिनूर हीरा, महाराजा रणजीत सिंह का सोने का सिंहासन , शाहजहां का हरिताश्म का शराब का प्याला और टीपू सुल्तान की तलवार जैसी प्राचीन बेशकीमती वस्तुओं को वापस लाने के लिए किए गए प्रयासों का खुलासा करने का निर्देश दिया है. ये सारी प्राचीन वस्तुएं भारतीय शानोशौकत की लोककथाओं का हिस्सा हैं और ये औपनिवेशिक आकाओं एवं आक्रमणकर्ताओं द्वारा ले जाए जाने के बाद दुनियाभर में विभिन्न संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं. Also Read - कोविड-19 के बाद के दौर में सेशेल्स के साथ द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करेगा भारत : जयशंकर

RTI से मांगी गई थी जानकारी
जब एक आरटीआई आवेदक विदेश मंत्रालय एवं प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क किया तब उसका आवेदन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पास भेज दिया. एएसआई ने कहा कि सामानों को वापस लाने का प्रयास करना उसके अधिकारक्षेत्र में नहीं है. आवेदक बी के एस आर आयंगर ने कोहिनूर हीरा, सुलतानगंज बुद्धा , नस्साक हीरा , टीपू सुलतान की तलवार और अंगूठी , महाराजा रणजीत सिंह का सोने का सिंहासन , शाहजहां का हरिताश्म का शराब का प्याला , अमरावती रेलिंग और बुद्धपाडे , सरस्वती की संगमरमर की मूर्ति – वाग्देवी तथा टीपू के मेकैनिकल बाघ को वापस लाने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयास से जुड़े रिकार्ड मांगे थे. Also Read - Amazing: 7 करोड़ का फ्लैट, छत से निकला पीपल का पेड़, प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंची बात!

सरकार भावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती
एएसआई ने कहा कि वह केवल उन्हीं प्राचीन वस्तुओं को फिर से हासिल करने का प्रयास करती है जो प्राचीन वस्तु एवं कला संपदा अधिनियम, 1972 का उल्लंघन कर अवैध रुप से विदेश निर्यात की गई हैं. सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यलु ने कहा कि ये चीजें भारत की हैं और अतीत , वर्तमान और भविष्य के लागों को उन्हें फिर हासिल किये जाने में रुचि है. सरकार इन भावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती. Also Read - Ceasefire Violations पर विदेश मंत्रालय ने पाकिस्‍तानी हाई कमीशन को तलब कर जताया कड़ा विरोध

संस्कृति मंत्रालय ने क्यों नहीं दी जानकारी
उन्होंने कहा कि संस्कृति मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय को आश्वासन दिया था कि वह प्रयास जारी रखेगा, ऐसे में यह किए गए प्रयासों या यदि कोई प्रगति हुई है तो उसकी जानकारी देना उसका काम था. लेकिन उसने यह पता होने के बाद भी, कि एएसआई को आजादी पूर्व कलाकृतियों को ब्रिटिश से हासिल करने का कानूनी हक नहीं है तो ऐसे में कैसे पीएमओ और संस्कृति मंत्रालय इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि आरटीआई आवेदन एएसआई के कामों से संबद्ध है.