नई दिल्ली. 2018 का कर्नाटक विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए महज देश के दक्षिणी राज्य में सत्ता हासिल करने जैसा नहीं है, यह पार्टी के देश पर ‘एकछत्र’ राज करने की मुहिम का हिस्सा भी है. जिस तरह से भाजपा ने देश के उत्तर-पूर्वी तीन राज्यों में अपना परचम लहराया है, यूपी के दो लोकसभा उपचुनावों में हार के बावजूद राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल की है, उसको देखते हुए पार्टी के आला नेता कर्नाटक की सत्ता में पार्टी की पुनर्वापसी के लिए गंभीर हैं. यही वजह भी है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं. कर्नाटक में भाजपा के लिए पूर्व सीएम और पार्टी नेता बी.एस. येदियुरप्पा की वापसी बड़ा करिश्मा साबित हो सकती है. वहीं चुनाव से पहले जिस तरह राज्य में बहुसंख्यक लिंगायत वोटों के ध्रुवीकरण का खेल खेला जा रहा है, उसे भी पार्टी अपने हक में मान रही है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने 2013 से पहले सत्ता में रही इस पार्टी की मजबूती और कमजोरियों का आकलन किया है. आइए पढ़ते हैं कर्नाटक में क्या है भाजपा की मजबूती और कमजोरियों के प्वाइंट्स. Also Read - पश्चिम बंगाल में बोले जेपी नड्डा, बहुत जल्द लागू होगा नागरिकता संशोधन कानून

मजबूतीः येदियुरप्पा का सीएम पद का उम्मीदवार होना
1. कर्नाटक के पूर्व सीएम और भाजपा के वरिष्ठ नेता बी.एस. येदियुरप्पा राज्य की राजनीति के सूरमा माने जाते हैं. 2011 में उन्होंने भाजपा छोड़ दी थी, लेकिन कुछ ही वर्षों में पार्टी से ‘अलग-थलग’ पड़ने का प्रभाव देखने के बाद वे वापस आ गए. इस बार के चुनाव में वे पार्टी के सीएम पद के उम्मीदवार हैं. येदियुरप्पा राज्य के बहुसंख्यक लिंगायत समुदाय से हैं, चुनाव में यह भाजपा के लिए असरकारी साबित होगा. Also Read - Bihar Polls 2020: बिहार चुनाव में गठबंधन 4, लेकिन मुख्यमंत्री पद के हैं ये 6 दावेदार

2. बी.एस. येदियुरप्पा के साथ-साथ बी. श्रीरामुलु ने भी भाजपा में वापसी कर ली है. 2013 के चुनावों में भाजपा की हार के कारणों में श्रीरामुलु का पार्टी से हटना भी माना जाता है. 2018 के चुनाव में भाजपा को येदियुरप्पा के साथ-साथ श्रीरामुलु का संग भी हासिल है. पार्टी यदि विधानसभा चुनाव जीतती है तो इन दोनों नेताओं का साथ आना बड़ा कारण होगा. Also Read - पीएम नरेंद्र मोदी का बयान- 6 सालों में हुए चौतरफा काम, अब बढ़ा रहे हैं उसकी गति और दायरा

3. राज्य के चुनावों में वोटों के लिहाज से बहुसंख्यक लिंगायत समुदाय को सबसे अहम माना जाता है. यह समुदाय 1990 के बाद से ही कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का साथ देता रहा है. ऐसे में पार्टी को उम्मीद है कि येदियुरप्पा के आने के बाद इस समुदाय के वोट उसके पक्ष में जाएंगे.

4. कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी का संगठन राज्य के चप्पे-चप्पे तक फैला हुआ है. विपक्षी कांग्रेस के मुकाबले भाजपा के कार्यकर्ताओं की मेहनत की बदौलत पार्टी ने राज्य के अधिकांश इलाकों तक अपनी पहुंच बना रखी है. आने वाले चुनाव में भाजपा का यही मजबूत कैडर उसकी जीत का आधार बनेगा.

5. विधानसभा चुनाव में या इससे पहले हुए अन्य चुनावों में भी पार्टी के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए सबसे बड़े चुनाव जिताऊ नेता रहे हैं. इस चुनाव में भी पीएम मोदी की रैली या जनसभाओं पर ही पार्टी सबसे ज्यादा भरोसा करेगी.

कमजोरीः येदियुरप्पा का भ्रष्टाचार बनेगा नासूर
1. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बी.एस. येदियुरप्पा यदि भाजपा के लिए तुरुप का पत्ता हैं, वहीं इसके उलट इसी नाम से पार्टी को खतरा भी है. क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर ही येदियुरप्पा की भाजपा से विदाई हुई थी. कांग्रेस इसे निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनाएगी.

2. येदियुरप्पा और भाजपा के ही एक अन्य वरिष्ठ नेता के.एस. ईश्वरप्पा के बीच की आपसी कलह से पार पाना भी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए जरूरी है. ये दोनों ही नेता एक ही जिले शिमोगा से आते हैं. ईश्वरप्पा ने येदियुरप्पा के पार्टी से हटने के बाद शिमोगा से चुनाव भी लड़ा था. वे येदियुरप्पा के खिलाफ लगातार हमले करते रहे हैं. हालांकि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद ईश्वरप्पा ने येदियुरप्पा के खिलाफ बयान देना बंद कर दिया है, लेकिन दोनों नेताओं के बीच सुलह के बाद ही चुनाव मैदान भाजपा के लिए ‘जोखिम रहित’ होगा.

3. कांग्रेस का इस राज्य में मजबूत जनाधार रहा है. भाजपा ने हालांकि ग्रामीण स्तर तक अपनी पैठ बना ली है, लेकिन कांग्रेस के मुकाबले यह अब भी बहुत मजबूत नहीं कहा जा सकता है.

4. जनता दल (एस) के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा का कमजोर पड़ना भी भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है.

5. पीएम मोदी भाजपा के स्टार प्रचारक हैं, लेकिन केंद्र में सत्तासीन हुए उन्हें चार साल हो चुके हैं. हाल के उपचुनावों में भाजपा की लगातार हार के बाद राजनीतिक विश्लेषक यह कहने लगे हैं कि अब मोदी का जादू नहीं चल रहा है. ऐसे में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी की अपील कितनी कारगर होगी, यह देखने वाली बात होगी.