किसानों ने इस रणनीति से दिया चकमा, सैटेलाइट नहीं पकड़ पाती पराली की आग, नासा ने किया खुलासा

शाम को जलने वाली पराली का धुआं रात में कम ऊंचाई वाली हवा और धीमी गति की वजह से जमीन के पास फंस जाता है.

Published date india.com Published: December 20, 2025 4:24 PM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तर भारत में हर सर्दी दिल्ली-एनसीआर की हवा जहरीली हो जाती है. पंजाब, हरियाणा और पड़ोसी राज्यों में धान की कटाई के बाद बची पराली को जलाना इसका प्रमुख कारण माना जाता रहा है. लेकिन 2025 में वैज्ञानिकों ने एक चौंकाने वाला बदलाव देखा, किसान अब पराली जलाने का समय बदलकर सैटेलाइट निगरानी को चुनौती दे रहे हैं, जिससे प्रदूषण की निगरानी और नियंत्रण दोनों कठिन हो गए हैं.

समय में बदलाव का खुलासा

नासा से जुड़े वायुमंडलीय वैज्ञानिक हिरेन जेठवा के अनुसार, पहले पराली ज्यादातर दोपहर 1 से 2 बजे के बीच जलाई जाती थी, जब नासा के MODIS और VIIRS जैसे पोलर-ऑर्बिटिंग सैटेलाइट क्षेत्र की स्कैनिंग करते थे. अब ज्यादातर आग शाम 4 से 6 बजे के बीच सुलगाई जा रही है. यह बदलाव दक्षिण कोरिया के GEO-KOMPSAT-2A जियोस्टेशनरी सैटेलाइट के डेटा से साफ हुआ, जो हर 10 मिनट में करता है.

2025 के एक अध्ययन में पाया गया कि 2020 में पीक टाइम दोपहर 1:30 बजे था, जो 2024 तक शाम 5 बजे तक खिसक गया. iForest की मल्टी-सैटेलाइट एनालिसिस ने भी इसकी पुष्टि की.

2025 में पराली जलाने की स्थिति

पंजाब और हरियाणा में 2025 की पराली जलाने की घटनाएं मध्यम स्तर पर रहीं. जेठवा के विश्लेषण से पता चला कि आग की संख्या 2024, 2020 और 2019 से ज्यादा थी, लेकिन 2023, 2022 और 2021 से कम.

नवंबर में दिल्ली का AQI कई दिन 400 के पार पहुंचा, जिससे स्कूल बंद हुए और निर्माण कार्य रुके. दिसंबर में भी स्थिति गंभीर बनी रही, कई इलाकों में AQI 450 से ऊपर दर्ज किया गया. हालांकि, कुछ आकलनों में स्टबल बर्निंग का योगदान कम बताया गया, लेकिन शाम की आग ने धुएं को ज्यादा घना बनाया.

शाम की आग क्यों ज्यादा घातक?

शाम को जलने वाली पराली का धुआं रात में कम ऊंचाई वाली हवा और धीमी गति की वजह से जमीन के पास फंस जाता है. नासा के एयर क्वालिटी रिसर्चर पवन गुप्ता के मुताबिक, पीक दिनों में पराली का योगदान PM2.5 में 40-70 प्रतिशत तक हो सकता है, जबकि पूरे सीजन में औसतन 20-30 प्रतिशत. इसमें वाहन उत्सर्जन, उद्योग, घरेलू ईंधन और धूल जैसे अन्य स्रोत भी जुड़ते हैं, जो प्रदूषण को और बढ़ाते हैं.

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जानबूझकर चकमा या मजबूरी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि किसान नासा को सीधे निशाना नहीं बना रहे, बल्कि स्थानीय अधिकारियों की निगरानी, जुर्माना और कार्रवाई से बचने के लिए समय बदल रहे हैं. जमीनी रिपोर्ट्स में पटवारी जैसे अधिकारियों के सुझाव भी सामने आए. इससे सैटेलाइट डेटा और वास्तविक प्रदूषण के बीच अंतर बढ़ गया है, जो वायु गुणवत्ता सुधार की कोशिशों को जटिल बना रहा है. वैज्ञानिक अब ज्यादा सटीक मॉनिटरिंग के लिए जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स पर जोर दे रहे हैं.

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