नई दिल्ली. पहले विदेशी भाषा सीखी, ताकि विदेशी सैलानियों को भारत में उन्हीं की भाषा में भारत को समझा सकें. फिर टूरिज्म सेक्टर में उतरे. अपनी कंपनी बनाई और बिजनेस कंसल्टेंसी शुरू की. विदेशी सैलानियों को भारत भ्रमण कराने के साथ-साथ उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट अभयारण्य में बाघों के संरक्षण के लिए अभियान भी चलाया. कुछ ऐसी ही कहानी है उत्तर प्रदेश के जौनपुर से आकर दिल्ली में अपने सपने को आकार देने वाले रमेश यादव की. India.com आपको रूबरू करा रहा है इसी युवा इंटरप्रेन्योर से. आइए पढ़ते हैं इनकी कहानी.

घूमना-फिरना किसे अच्छा नहीं लगता. घुमक्कड़ी शौक भी है. लेकिन कुछ ही लोग होते हैं जो अपने शौक को पेशे में बदल पाते हैं. ऐसे ही शख्स हैं रमेश यादव. पर्यटन रमेश को शुरू से अच्छा लगता था. इसलिए 12वीं के बाद से ही टूरिज्म सेक्टर से जुड़ी एक कंपनी में चले गए. यहां देशी या विदेशी सैलानियों को भारत की सैर कराने का काम मिला. कुछ दिनों तक नौकरी करने के बाद रमेश ने सोच लिया कि अपने शौक को ही पेशा बनाया जाए. यह न सिर्फ नौकरी से बेहतर था, बल्कि अपनी रुचि का भी काम था. आज रमेश अपनी ट्रेवल कंपनी चलाते हैं.

विदेशियों के साथ घूमने को सीखी उनकी भाषाएं
रमेश यादव का बचपन दिल्ली में ही बीता. उन्होंने बताया, ’12वीं के बाद ही टूरिज्म कंपनी से जुड़ गया. वहां रहते हुए कई देशों के सैलानियों के साथ देश घूमा. खासकर जापानियों के साथ. इसलिए जापानी भाषा सीख ली. इसी दौरान 1997 में एक कोरियाई टीम के साथ रहकर सोचा कि क्यों न कोरियन भाषा सीख ली जाए. लिहाजा दक्षिण कोरिया चला गया. वहां तीन महीने की ट्रेनिंग के दौरान 20-20 घंटे की पढ़ाई की, ताकि जल्द से जल्द भाषा पर अधिकार हो सके. लेकिन इसी बीच कोरिया की अर्थव्यवस्था में मंदी आ गई और मुझे देश लौटना पड़ा.’ रमेश ने बताया कि देश लौटकर कोरियन भाषा भूल न जाएं, इसके लिए ज्यादा मशक्कत करनी पड़ी. वे दिल्ली यूनिवर्सिटी जाकर वहां पढ़ने वाले कोरियाई छात्रों को अंग्रेजी पढ़ाते थे, बदले में उनसे कोरियाई भाषा में बात कर लेते थे.

रमेश बताते हैं, ‘नई दिल्ली स्टेशन के पहाड़गंज साइड में कई होटल हैं जहां विदेशी आते हैं. मैं कोरियन भाषा भूल न जाऊं, इसके लिए रोज वहां जाकर कोरियाई पर्यटकों को ढूंढ़ता था और उनसे बातें करके सीखी हुई भाषा को याद रखने की कोशिश करता था.’ इसी दौरान वर्ष 1999 में उनकी मुलाकात कोरियाई भिक्षुओं के एक दल से हुई जो तीन महीने तक भारत भ्रमण करना चाहता था. रमेश को इस दल से काम मिल गया और कोरियाई भिक्षुओं को उनकी भाषा का जानकार. रमेश के साथ कोरियाई भिक्षुओं का यह दल करगिल की लड़ाई के दौरान भी कश्मीर की सैर करता रहा. यह उनके लिए जीवन के बेहतरीन अनुभवों में से एक है. रमेश यादव बताते हैं कि कोरियाई भिक्षुओं के साथ तीन महीने के टूर प्रोग्राम से उनका पर्यटन क्षेत्र में आने का निश्चय और दृढ़ हो गया.

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नार्वे, इटली और बेल्जियम टूर से आया टर्निंग प्वाइंट
रमेश यादव बताते हैं कि 2001 में उन्होंने फिर से टूर कंपनी में नौकरी शुरू कर दी. इसी क्रम में 2003 में उन्हें नार्वे, इटली और बेल्जियम के टूर करने का मौका मिला. ये काम करने के लिहाज से रमेश के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ, क्योंकि इन तीन देशों के साथ उनके निजी तौर पर व्यावसायिक संबंध स्थापित हो गए. इन देशों की यात्रा के दौरान रमेश को यह अनुभव भी हुआ कि विदेश के कई कारोबारी भारत में अपना कारोबार फैलान चाहते हैं, लेकिन यहां उन्हें भाषाई समस्या का सामना करना पड़ता है. खासकर कोरियाई देश के कारोबारी कमजोर अंग्रेजी के कारण इस समस्या से ज्यादा रूबरू होते थे. इन अनुभवों से सीख लेकर रमेश ने अपने बड़े भाई के साथ मिलकर खुद की कंपनी खोल ली. 2006 तक आते-आते काम बढ़ा तो उन्हें स्वतंत्र रूप से ऑफिस खोलना पड़ा. अब रमेश के पास दो काम थे, एक पर्यटन और दूसरा कंसल्टेंसी का. आज वे इन दोनों कामों में ही पारंगत हो चुके हैं. अब वे जहां विदेशी सैलानियों के टूर प्रोग्राम अरेंज करते हैं, वहीं विदेशी कारोबारियों के इवेंट मैनेजमेंट से भी जुड़े हुए हैं.

सैर-सपाटे के साथ बाघ संरक्षण की मुहिम भी चलाई
रमेश यादव बताते हैं कि विदेशी सैलानियों को वे अक्सर उत्तराखंड में स्थित जिम कॉर्बेट अभयारण्य की सैर कराते हैं. इस पेशे में आने से पहले भी अपने जंगल प्रेम के कारण वे जिम कॉर्बेट आते रहे हैं. यहां जंगल में उन्हें शिकारियों की गतिविधियों की सूचना मिलती रहती थी. इसको लेकर रमेश यादव ने कुछ लोगों के साथ मिलकर एक समूह बनाया और जिम कॉर्बेट के आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों को जागरूक करना शुरू किया. रमेश बताते हैं, ‘जिम कॉर्बेट के पास के ग्रामीण शिकारियों के दबदबे के कारण सहमे रहते थे. उनकी शिकायत नहीं करते थे. हम लोगों ने गांव वालों से कहा कि वे शिकारियों की सूचना हमें दें. हम प्रशासन के साथ मिलकर कार्रवाई कराएंगे.’ इस अभियान का असर हुआ. प्रशासन के सहयोग से जिम कॉर्बेट अभयारण्य में शिकारियों का प्रकोप कम हो गया. रमेश कहते हैं, ‘जंगल और वहां के प्राणियों को हमें सुरक्षित रखना ही होगा. तभी प्रकृति बचेगी और हां, पर्यटन उद्योग भी बढ़ेगा.’

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