नई दिल्ली. महाराष्ट्र में ‘एक मराठा लाख मराठा’ का नारा लगाया जाता है. त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के पीछे भी ‘एक मराठा’ ही है. उस एक मराठी मानुष की मेहनत आज राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बनी हुई हैं. जी हां, त्रिपुरा में मराठी मानुष सुनील देवधर ही वह शख्स हैं, जो भाजपा के लिए ‘अच्छे दिन’ लाने वाले प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक रहे हैं. उन्होंने की माणिक सरकार के 25 सालों के शासन का ऐसा खात्मा किया है. हालांकि किसी भी चुनाव में जीत का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना तर्कसंगत नहीं है. इसके पीछे पार्टी की रणनीति, चुनाव प्रचार, कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता होती है. बावजूद इसके सुनील देवधर जैसे चेहरे होते हैं, जो सफलता की ऐसी शानदार कहानी लिखते हैं. पांच साल पहले त्रिपुरा में जिस भाजपा को कोई जानता भी नहीं था, विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका था, वहां सुनील देवधर जैसे लोगों की मेहनत ने आज सभी राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाने वाला परिणाम दिया है. Also Read - आंध्रप्रदेश में TDP का सूपड़ा साफ करेगी भाजपा, दर्जनभर से ज्यादा विधायक छोड़ सकते हैं पार्टी

बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने का कौशल
सुनील देवधर पूर्वोत्तर भारत में भाजपा का वो चेहरा हैं जिसने खुद न तो कभी यहां चुनाव लड़ा और न ही खुद को समाचारों में ही रखा. मगर त्रिपुरा में 25 सालों की वाम सरकार को चुनौती देने और उससे सत्ता छीन लेने का सेहरा भाजपा सुनील देवधर के सिर ही बांधती है. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 60 में से 49 सीटें आई थीं. वहीं, सीपीआई को एक. दस सीटों के साथ कांग्रेस त्रिपुरा में प्रमुख विपक्षी पार्टी बनी थी. मगर इस बार सुनील देवधर की मेहनत से भाजपा न सिर्फ माकपा को टक्कर देने की स्थिति में आई, बल्कि बूथ स्तर तक संगठन खड़ा कर आज पार्टी के सिर पर जीत का सेहरा भी बांध दिया. सुनील देवधर का सबसे मजबूत पक्ष रहा निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं को ढूंढ़ना और उन्हें पार्टी में अहमियत देना. त्रिपुरा में वाम दलों की जो कार्यशैली रही है मसलन जिस तरह वो अपने कैडर बनाते हैं, उसी को देवधर ने चुनौती देने का काम किया. Also Read - hindus are also beef eaters in tripura so we can not put a ban on it says sunil deodhar | त्रिपुरा में हिंदू भी खाते हैं बीफ, नहीं होना चाहिए बैनः बीजेपी प्रभारी सुनील देवधर

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सटीक रणनीति से नाराज नेताओं को भाजपा में मिलाया
सुनील देवधर कई साल से पूर्वोत्तर भारत में संघ के प्रचारक के तौर पर काम कर रहे हैं. शिलांग में रहते हुए वे संघ में दंड (लाठी) चलाने का प्रशिक्षण देते थे. संघ के प्रचारक बतौर ही वे पूर्वोत्तर के राज्यों का दौरा भी करते रहते थे. देवधर ने कई मौकों पर कहा भी है कि पूर्वोत्तर भारत का दौरा करने के दौरान वे कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेताओं से मिलते रहते थे. इससे एक तरफ जहां उन्हें दोनों पार्टियों की गतिविधियों की जानकारी मिल जाती थी, वहीं उन पार्टियों से नाराज नेताओं से संपर्क भी बढ़ जाता था. ऐसे कई नाराज नेताओं से बातचीत के बाद देवधर ने उन्हें भाजपा में मिलाया. ऐसे ही नेताओं की बढ़ती तादाद ने पूर्वोत्तर भारत में भारतीय जनता पार्टी को मजबूत बना दिया. और आज यह पार्टी न सिर्फ कांग्रेस, बल्कि यहां की स्थानीय पार्टियों से भी मुकाबला लेने की हैसियत में आ गई है. Also Read - BJP leader Sunil Deodhar asks Tripura CM to get septic tanks cleaned of Ministers' residences | भाजपा नेता की अनोखी मांग, सेप्टिक टैंक साफ कराएं सीएम, तब घरों में रहने जाएंगे मंत्री

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पूरे पूर्वोत्तर में सक्रिय, सीख लीं वहां की भाषाएं भी
सुनील न सिर्फ त्रिपुरा और मेघालय में सक्रिय रहे, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों में संघ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में सक्रिय रहे. अमित शाह ने जब भाजपा की कमान संभाली तो उन्होंने सुनील देवधर को महाराष्ट्र से वाराणसी भेजा था जहां नरेंद्र मोदी लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे. पूर्वोत्तर भारत में काम करते-करते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे सुनील देवधर ने स्थानीय भाषाएं सीखीं. जब वो मेघालय के खासी और गारो जनजाति के लोगों से उन्हीं की भाषा में बात करने लगे तो लोग हैरान हो गए. उसी तरह वो फर्राटे से बांग्ला भाषा भी बोलते हैं. लोग बताते हैं कि त्रिपुरा में वाम दलों, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में सेंध मारने का काम भी उन्होंने ही किया है. विधानसभा के चुनावों से ठीक पहले इन दलों के कई नेता और विधायक भाजपा में शामिल हो गए.