नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूछा कि राष्ट्रीय राजधानी में कूड़े के पहाड़ के लिए कौन जिम्मेदार है, वे अधिकारी जो उपराज्यपाल के प्रति जवाबदेह हैं, या वे लोग जो मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह हैं? न्यायालय ने बुधवार तक जवाब देने के लिए कहा है. कोर्ट ने यह निर्देश ऐसे समय में दिया जब कुछ दिन पहले उसने एलजी और आम आदमी पार्टी सरकार के बीच सत्ता संघर्ष पर फैसला सुनाते हुए व्यवस्था दी थी कि उपराज्यपाल के पास फैसले करने की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है. वे निर्वाचित सरकार की मदद एवं सलाह से काम करने के लिए बाध्य हैं. Also Read - सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई रिपोर्ट, देश में 4442 नेता हैं अपराधी, नंबर वन यूपी, दूसरे नंबर पर बिहार

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बुधवार तक हलफनामा, गुरुवार को सुनवाई

न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से इस बारे में हलफनामा देने के लिए कहा है कि दिल्ली में कूड़े की सफाई के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए और कचरा प्रबंधन किसके अधिकार क्षेत्र में आता है. पीठ ने केंद्र और दिल्ली सरकार से इस संबंध में बुधवार तक हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा और मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए तय कर दी.

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मुंबई के हालात की भी चर्चा

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि दिल्ली कचरे के पहाड़ के नीचे दबी जा रही है और मुंबई पानी में डूब रहा है, लेकिन सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं. इसके साथ ही कोर्ट ने ठोस कचरा प्रबंधन संबंधित अपनी नीतियों पर हलफनामा दाखिल न करने पर 10 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों पर जुर्माना लगा दिया. शीर्ष अदालत ने इसके पहले केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर एक चार्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था कि क्या राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ठोस कचरा प्रबंधन नियम 2016 के प्रावधानों के अनुरूप राज्यस्तरीय सलाहकार बोर्ड गठित कर लिए हैं या नहीं. न्यायालय ठोस कचरा प्रबंधन नियम के क्रियान्वयन से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रहा था.

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अधिकारों से संबंधित अपील पर सुनवाई अगले सप्‍ताह

इधर, संविधान पीठ के हाल के फैसले के आलोक में सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को विभिन्न अधिकारों के दायरे से संबंधित दिल्ली सरकार की अपीलों पर अगले सप्ताह सुनवाई के लिये सहमत हो गया. संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि उपराज्यपाल के पास निर्णय लेने के लिये कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है. दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर चली रस्साकसी का मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा था. हाई कोर्ट ने चार अगस्त, 2016 को अपने फैसले में कहा था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया हैं. हाई कोर्ट के इस निर्णय को केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. इन अपीलों पर सुनवाई के दौरान ही अनुच्छेद 239 ए ए की व्याख्या का मुद्दा उठने पर न्यायाधीशों की पीठ ने इसे संविधान पीठ को सौंप दिया था.