Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की ग्रेच्युटी को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी कर्मचारी पर किसी तरह का कोई बकाया है तो उसकी ग्रेच्युटी का पैसा रोका या जब्त किया जा सकता है. न्यायमूर्ति संजय के. कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने शनिवार को ये फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी कर्मचारी की ग्रेच्युटी से दंडात्मक किराया- सरकारी आवास में रिटायरमेंट के बाद रहने के लिए जुर्माना सहित किराया वसूलने को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं है. Also Read - Kisan Andolan: कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति की पहली बैठक कल

ताजा मामला झारखंड उच्च न्यायालय के एक आदेश का है, जिसमें स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा एक कर्मचारी से 1.95 लाख रुपये की जुर्माना राशि वसूल करने का प्रयास किया था, जिसने अपना बकाया और ओवरस्टाईड क्लियर नहीं किया था. कर्मचारी 2016 में सेवानिवृत्ति के बाद बोकारो में आधिकारिक आवास में बना रहा. Also Read - भगोड़े शराब कारोबारी Vijay Mallya को कब लाया जाएगा भारत, क्यों हो रही देर? सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दी यह जानकारी

उच्च न्यायालय ने शीर्ष अदालत के 2017 के आदेश पर भरोसा किया और कहा कि सेल को कर्मचारी की ग्रेच्युटी तुरंत जारी करनी चाहिए. हालांकि, इसने सेल को सामान्य किराए की मांग को बढ़ाने की अनुमति दी. Also Read - किसानों की ट्रैक्टर रैली पर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सरकार के पास इसे निपटाने के सभी अधिकार, पुलिस को जो करना है करे

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है-दंड के साथ कर्मचारी से पैसे वसूले जा सकते हैं

पीठ ने कहा, “यदि कोई कर्मचारी निर्धारित किए गए समय से अधिक समय तक कब्जा करता है, तो उससे दंड के साथ किराया वसूला जा सकता है और अगर कर्मचारी पैसा नहीं देता हैं तो ग्रेच्युटी की राशि में से पैसे काटा जा सकता है.’

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पहले इसके विपरीत निर्णय दिया था, जब  2017 में एक डिवीजन बेंच ने एक कर्मचारी की ग्रेच्युटी को सेवानिवृत्ति के बाद आधिकारिक क्वार्टर में रिटायरमेंट के बाद रहने के कारण जब्त करने के खिलाफ प्रतिकूल फैसला सुनाया था. उस वक्त कोर्ट ने ग्रेच्युटी को तत्काल जारी करने का आदेश दिया था और केवल सामान्य किराया ही रखा था, न कि जुर्माना के साथ.

हालांकि, न्यायमूर्ति कौल की अगुवाई वाली तीन-न्यायाधीशों वाली बेंच ने अब यह माना है कि 2017 के आदेश पर कोई भी निर्भरता गलत है क्योंकि यह एक निर्णय भी नहीं है, बल्कि उस मामले के दिए गए तथ्यों पर एक आदेश है. यह स्पष्ट किया कि 2017 के आदेश को एक मिसाल के रूप में नहीं माना जा सकता है.

बड़ी बेंच ने शीर्ष अदालत के 2005 के फैसले का भी हवाला दिया जब उसने नियोक्ता द्वारा उसे प्रदान किए गए आवास के अनधिकृत कब्जे के लिए एक कर्मचारी से दंडात्मक किराया की वसूली को बरकरार रखा था. इस फैसले में, हालांकि अदालत ने स्वीकार किया कि ग्रेच्युटी जैसे पेंशन लाभ एक इनाम नहीं है. यह माना गया था कि बकाया की वसूली संबंधित कर्मचारी की सहमति के बिना ग्रेच्युटी से की जा सकती है.