नई दिल्ली: आरक्षण मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बयान दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं आता. कोर्ट ने यह बयान तमिलनाडु में मेडिकल सीटों पर OBC आरक्षण नहीं दिए जाने के खिलाफ याचिका पर कहा और इस मामले पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा कि कोई भी आरक्षण के अधिकार को मौलिक अधिकार की परिभाषा से संबोधित नहीं कर सकता. Also Read - विकास दुबे के एनकाउंटर से चंद घंटे पहले सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई थी याचिका, हत्या की जताई गई थी आशंका, जानें सच

दरअसल तमिलनाडु में NEET परीक्षा में OBC सीट में रिजर्वेशन नहीं दिए जाने के बाद डीएमके, एआईडीएमके, सीपीएम, तमिलनाडु सरकार और तमिलनाडु की कई पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दयार की थी. Also Read - तमिलनाडु सरकार ने कहा- मेडिकल, डेंटल सीटों पर अखिल भारतीय कोटा में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए उठा रहे हैं कदम

कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया. इसी दौरान जस्टिस राव ने कहा कि आरक्षण कोई बुनियादी अधिकार नहीं है. सभी यचिकाएं सुप्रीम कोर्ट से वापस ली जाएं. आप हाईकोर्ट जा सकते हैं. Also Read - आर्मी में वुमन ऑफिसर्स के स्थायी कमीशन का मामला: SC ने केंद्र को दिया एक माह का समय

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पार्टियों से कहा कि आप की बातों से लगता है कि आप कुछ लोगों की ही भलाई की बात कर रहे हैं. DMK की तरफ से कहा गया कि हम अदालत से अलग से आरक्षण की मांग नहीं कर रहे है बल्कि रिजर्वेशन को लेकर जो नियम हैं उसे लागू करने की अपील कर रहे हैं.

तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी सीपीआई, डीएमके और उसके कुछ नेताओं द्वारा सीटों में 50 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण, 2020-21 में यूजी, पीजी मेडिकल और डेंटल कोर्स में आरक्षण को शामिल करने के लिए याचिका दायर की गई थी.

पीठ ने इस मामले की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के दौरान कहा, “आप इसे वापस लीजिए और मद्रास उच्च न्यायालय जाएं.” पीठ ने राजनीतिक दलों को ऐसा करने की छूट प्रदान की. इन राजनीतिक दलों ने मेडिकल के वर्तमान शैक्षणिक सत्र के दौरान तमिलनाडु द्वारा छोड़ी गई सीटों में राज्य के आरक्षण कानून के तहत अन्य पिछड़े वर्गो के लिए 50 फीसदी स्थान आरक्षित नहीं करने के केन्द्र के फैसले को चुनौती दी थी.