नई दिल्ली. केंद्र सरकार बना दिल्ली सरकार के बीच शक्तियों के बंटवारे से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ की इस सवाल पर अलग-अलग राय है कि राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं पर नियंत्रण किसके पास है. इसके बाद कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं के नियंत्रण पर अपना खंडित फैसला वृहद पीठ के पास भेजा.Also Read - Nupur Sharma Updated News: सुप्रीम कोर्ट ने पहले लगाई थी फटकार, अब नूपुर शर्मा की अर्जी पर लगाई मुहर | Watch Video

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दो सदस्यीय पीठ भ्रष्टाचार रोधी शाखा, राजस्व, जांच आयोग और लोक अभियोजक की नियुक्ति के मुद्दे पर सहमत हुई. कोर्ट ने केंद्र की इस अधिसूचना को बरकरार रखा कि दिल्ली सरकार का एसीबी भ्रष्टाचार के मामलों में उसके कर्मचारियों की जांच नहीं कर सकता. यह भी कहा कि केंद्र के पास जांच आयोग नियुक्त करने का अधिकार होगा. बहरहाल, दिल्ली सरकार के पास बिजली आयोग या बोर्ड नियुक्त करने या उससे निपटने का अधिकार है. Also Read - 'जनसंख्या विस्फोट' नियंत्रण के लिए कानून बनाने की मांग, केंद्र को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

कोर्ट ने ये भी कहा
कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल के बजाय दिल्ली सरकार के पास लोक अभियोजकों या कानूनी अधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार होगा. भूमि राजस्व की दरें तय करने समेत भूमि राजस्व के मामलों को लेकर अधिकार दिल्ली सरकार के पास होगा. इसके साथ ही उपराज्यपाल को अनावश्यक रूप से फाइलों को रोकने की जरुरत नहीं है और राय को लेकर मतभेद होने के मामले में उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए.

4 जुलाई को संविधान पीठ ने की थी व्याख्या
बता दें कि पिछले साल 4 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार बनाम एलजी अधिकार विवाद में सिर्फ संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या की थी. इस दौरान पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि कानून बनाना दिल्ली सरकार का अधिकार है.

उस समय संविधान पीठ ने ये कहा था
संविधान पीठ ने इस बात को सर्वसम्मति से माना था कि असली शक्ति मंत्रिमंडल के पास है और चुनी हुई सरकार से ही दिल्ली चलेगी. कोर्ट ने उस वक्त कहा था कि कानून व्यवस्था, पुलिस और ज़मीन को छोड़ कर बाकी मामलों में उपराज्यपाल स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते.