
Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
Supreme Court Alimony Ruling: वैवाहिक विवादों के दौरान भरण-पोषण’ या गुजारा भत्ता (Alimony) हमेशा से एक जटिल और बहस का विषय रहा है. अक्सर देखा जाता है कि तलाक या अलगाव के मामलों में पति अपनी वास्तविक आय को छिपाने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें कम से कम मेंटेनेंस देना पड़े, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले की सुनवाई करते हुए जो सख्त टिप्पणियां की हैं. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान उन बुनियादी सिद्धांतों को फिर से दोहराया है जो एक सक्षम पति की जिम्मेदारियों को परिभाषित करते हैं. इस मामले में पति द्वारा अपनी मासिक आय को मात्र 9,000 रुपये बताए जाने पर कोर्ट ने न केवल अविश्वास जताया, बल्कि यह भी कह दिया कि अगर जरूरत पड़े तो पति को किसी भी तरह से धन जुटाना होगा. आइए विस्तार से जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या कहा और कानून की नजर में एक पति की जिम्मेदारी की सीमा क्या है..
यह मामला एक पति-पत्नी के बीच चल रहे तलाक और गुजारा भत्ता के विवाद से जुड़ा है. ट्रायल कोर्ट ने पहले पत्नी को अंतिम निपटारे के रूप में 6 लाख रुपये की राशि देने का आदेश दिया था, जिसे पति ने चुका दिया था. लेकिन पत्नी इस राशि से संतुष्ट नहीं थी और उसने हाई कोर्ट का रुख किया. हाई कोर्ट से अर्जी खारिज होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां पत्नी ने 30 लाख रुपये की एकमुश्त राशि या 12,000 रुपये प्रति माह के मेंटेनेंस की मांग की.
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पति के वकील ने दलील दी कि उनका मुवक्किल हिंदुस्तान ऑटो एजेंसी में काम करता है और प्रतिदिन केवल 325 रुपये कमाता है. इस हिसाब से उसकी मासिक आय लगभग 9,000 रुपये बैठती है. वकील ने कोर्ट को बताया कि पति अपने भाई-बहनों के भरोसे है और बच्चों की शिक्षा का खर्च भी बड़ी मुश्किल से उठा पा रहा है. उसने यह भी कहा कि पिछला बकाया देने के लिए उसके पिता को अपनी जमीन तक बेचनी पड़ी थी.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच पति की दलील सुनकर हैरान रह गई. जस्टिस नाथ ने वकील से सीधे सवाल किया कि आजकल के जमाने में 9,000 रुपये कौन कमाता है? कोर्ट ने पति की आय के आंकड़ों को पचाने में असमर्थता जताई. जब वकील ने दोहराया कि वह सात दिन काम करता है, तब कोर्ट ने कहा कि वे सीधे उस कंपनी, एंप्लॉयर, को समन भेजकर सच्चाई का पता लगा सकते हैं.
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने बेहद कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने मेंटेनेंस के कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि सिद्धांत यह है कि अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए आपको चाहे भीख मांगनी पड़े, उधार लेना पड़े या चोरी करनी पड़े (Beg, Borrow, Steal), लेकिन यह आपकी जिम्मेदारी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति अपनी वित्तीय क्षमता का बहाना बनाकर पत्नी को उसके अधिकारों से वंचित नहीं रख सकता.
पत्नी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट के सामने दो प्रस्ताव रखे. पहला यह कि पति को अपनी पत्नी को जीवनभर के लिए 12,000 रुपये प्रति माह देने चाहिए, जिसमें हर साल बढ़ोतरी का प्रावधान हो. दूसरा विकल्प यह दिया गया कि यदि पति मासिक खर्च नहीं उठा सकता, तो वह एकमुश्त 30 लाख रुपये का भुगतान करे. पत्नी का तर्क था कि 6 लाख रुपये की मामूली राशि में सम्मानजनक जीवन जीना संभव नहीं है.
सुनवाई के दौरान एक मौका ऐसा भी आया जब कोर्ट ने हल्के-फुल्के अंदाज में पति के वकील पर भी टिप्पणी कर दी. जस्टिस नाथ ने मजाक में कहा कि अगर पति के पास पैसे नहीं हैं, तो उनके वकील साहब को भी मेंटेनेंस की राशि में कुछ योगदान देना चाहिए. हालांकि यह बात मजाक में कही गई थी, लेकिन इसने यह संकेत दे दिया कि कोर्ट पति द्वारा पेश किए गए आय के हलफनामे से जरा भी संतुष्ट नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गहराई से जांच करने के संकेत दिए हैं. जस्टिस नाथ ने कहा कि वे उस ऑटो एजेंसी के मालिक को बुलाएंगे जहां पति काम करता है ताकि यह पता चल सके कि वहां के कर्मचारियों को वास्तव में कितना वेतन दिया जा रहा है. जस्टिस मेहता ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारियों से इस बारे में जांच कराई जा सकती है ताकि पति की असली वित्तीय स्थिति और उसकी लाइफस्टाइल का सच सामने आ सके. हालांकि, कोर्ट ने पति की कम आय वाली दलील पर अविश्वास जताते हुए मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया है.
हिंदू मैरिज एक्ट या मेंटनेंस से जुड़े नियमों के तहत यह माना जाता है कि एक शारीरिक रूप से सक्षम पति की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी को उसी स्तर का जीवन प्रदान करे जैसा वह खुद जीता है. कोर्ट आमतौर पर पति की कल्पित आय (Notional Income) को आधार मानता है, न कि केवल उसके द्वारा बताए गए कम वेतन को. इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख इसी ओर इशारा कर रहा है कि पति कम कमाई का बहाना बनाकर बच नहीं सकता.
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