
Tanuja Joshi
हल्द्वानी से दिल्ली के बड़े न्यूजरूम तक... तनुजा जोशी, उत्तराखंड के शांत और खूबसूरत शहर हल्द्वानी से ताल्लुक रखती हैं. देहरादून के ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी ... और पढ़ें
Supreme Court on Bail: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति को POCSO एक्ट के तहत दर्ज मामले में जमानत दी गई थी. आरोपी पर एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार और यौन शोषण के गंभीर आरोप थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का जमानत आदेश गलत, अव्यावहारिक और अहम सबूतों की अनदेखी करने वाला था.
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि सिर्फ चार्जशीट दाखिल हो जाना जमानत देने या न देने का अकेला आधार नहीं हो सकता. अदालत को जमानत पर फैसला करते समय अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और जांच में सामने आए सबूतों को ध्यान में रखना जरूरी है. इस मामले में आरोप बेहद संगीन थे. नाबालिग पीड़िता के साथ बार-बार यौन शोषण, हथियार दिखाकर डराना और वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करना. कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराध पीड़िता के जीवन पर गहरा असर डालते हैं और समाज की अंतरात्मा को झकझोर देते हैं.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी पीड़िता को जानता था और उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर करीब छह महीने तक उसका यौन शोषण किया. आरोप है कि देशी पिस्तौल दिखाकर धमकाया गया और मोबाइल फोन पर वीडियो बनाकर पीड़िता को ब्लैकमेल किया गया. शुरू में पुलिस ने मामला दर्ज करने में देरी की, लेकिन बाद में 2 दिसंबर 2024 को एफआईआर दर्ज हुई. सेशंस कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया था, लेकिन अप्रैल 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी. इसके बाद पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और आरोप लगाया कि जमानत पर छूटने के बाद आरोपी गांव में उसे धमका रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय अपराध की गंभीरता और POCSO कानून की सख्ती को नजरअंदाज किया. कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी और पीड़िता एक ही इलाके में रहते हैं, जिससे पीड़िता को डर और मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है. चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की रिपोर्ट में भी पीड़िता के भय और मानसिक दबाव की बात सामने आई है. कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका बहुत गंभीर होती है. ऐसे मामलों में पीड़िता की सुरक्षा और निष्पक्ष ट्रायल सबसे ज्यादा जरूरी है.
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जमानत न तो मशीन की तरह खारिज की जानी चाहिए और न ही बिना ठोस कारणों और जरूरी तथ्यों पर विचार किए दी जानी चाहिए. अगर जमानत का आदेश गलत तथ्यों पर आधारित हो या न्याय को नुकसान पहुंचाता हो, तो सुप्रीम कोर्ट को उसमें दखल देने का पूरा अधिकार है. इस मामले में हाईकोर्ट का जमानत आदेश गंभीर चूक के कारण रद्द किया गया.
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें India Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.