नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गो के लिए सरकारी नौकरी और शिक्षा में दस फीसदी आरक्षण को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सोमवार को केन्द्र सरकार को नोटिस जारी किया. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश वेंगल ईश्वरैया और अन्य की याचिका पर केन्द्र को नोटिस जारी करने के साथ ही इसे भी पहले से लंबित याचिकाओं के साथ संलग्न कर दिया.

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इस याचिका में भी संविधान (103वां संशोधन) कानून, 2019 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. याचिका में इस कानून को निरस्त करने का अनुरोध करते हुये कहा गया है कि सिर्फ आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है.

इससे पहले, गैर सरकारी संगठन जनहित अभियान, यूथ फार इक्वेलिटी और कांग्रेस समर्थक कारोबारी तहसीन पूनावाला भी इस संविधान संशोधन को शीर्ष अदालत में चुनौती दे चुके हैं. न्यायालय ने इस सभी याचिकाओं पर केन्द्र से जवाब मांगा है.

इन याचिकाओं पर भी शीर्ष कोर्ट जारी कर चुका है केंद्र को नोटिस
बीती 8 फरवरी को सुप्रमी कोर्ट ने सवर्णों को आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के केन्द्र के निर्णय को चुनौती देने वाली एक नई याचिका पर केन्द्र से शुक्रवार को जवाब मांगा था. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह स्पष्ट किया कि सवर्ण जाति के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को नौकरियों और दाखिले में आरक्षण देने के केन्द्र के फैसले पर कोई रोक नहीं लगाई जाएगी. कोर्ट इससे पहले इसी प्रकार की याचिकाओं पर केन्द्र को नोटिस जारी कर चुका है. कोर्ट तहसीन पूनावाला की ओर से दाखिल नई याचिका को लंबित याचिकाओं में जोड़ने का शुक्रवार को आदेश दिया।

‘जनहित अभियान और एनजीओ ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी ने दी थी चुनौती
केन्द्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं ‘जनहित अभियान और एनजीओ ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी’ सहित अनेक पक्षकारों ने दाखिल की हैं. यूथ फॉर इक्वेलिटी ने अपनी याचिका में विधेयक को रद्द करने की मांग की है. एनजीओ के अध्यक्ष कौशल कांत मिश्रा की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि आरक्षण के लिए केवल आर्थिक कसौटी ही आधार नहीं हो सकता और यह विधेयक संविधान के बुनियादी नियमों का उल्लंघन करता है, क्योंकि आर्थिक आधार पर आरक्षण को सामान्य वर्ग तक ही सीमित नहीं किया जा सकता और कुल 50 प्रतिशत की सीमा को भी पार नहीं किया जा सकता. वहीं, पूनावाला की ओर से दाखिल नई याचिका में विधेयक को रद्द करने की मांग करते हुए कहा गया है कि आरक्षण के लिए पिछड़ेपन को केवल आर्थिक स्थिति से परिभाषित नहीं किया जा सकता।

सरकार ने आरक्षण की निर्णय प्रक्रिया का ब्योरा देने से किया था इनकार
बता दें सरकार ने आरटीआई कानून के कैबिनेट दस्तावेजों और मंत्रियों की बातचीत के रिकार्डों के खुलासे पर रोक संबंधी उपबंध का हवाला देते हुए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण पर निर्णय की प्रक्रिया का ब्योरा साझा करने से इनकार कर दिया था. एनजीओ कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट इनिशिएटिव (सीएचआरआई) के साथ सूचना तक पहुंच कार्यक्रम के समन्वयक वेंकटेश नायक ने इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय से प्राप्त पत्राचार के अलावा कैबिनेट नोट की प्रतिलिपि जैसी जानकारियां मांगी थी.