नई दिल्ली: जंतर मंतर पर रैली और धरना आयोजित करने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबंध हटाये जाने के बाद दिल्ली पुलिस यहां अधिकतम एक दिन और 5,000 तक प्रदर्शनकारियों को ही अनुमति देने की सिफारिश कर सकती है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए एक स्थल के रूप में फिर से डिजाइन किया जा रहा है, ऐसे में विरोध प्रदर्शनों का उनका काम आसान हो जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘‘कानून और व्यवस्था प्रभावित होने पर पिछले साल जंतर मंतर के आसपास सभी प्रदर्शनों और धरनों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण के प्रतिबंध के बाद प्रदर्शनकारी मामले पर सुप्रीम कोर्ट से फैसला चाह रहे थे. न्यायालय द्वारा जंतर मंतर पर रैलियों पर लगा प्रतिबंध हटाने के साथ ही स्थिति की निगरानी करने का हमारा काम आसान हो जाएगा.’’

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने जंतर मंतर और बोट क्लब इलाकों में धरना, प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन पर लगा पूर्ण प्रतिबंध सोमवार को खत्म कर दिया और कहा कि इन इलाकों में विरोध प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता. अदालत ने केन्द्र सरकार से कहा कि इस तरह के आयोजनों को मंजूरी देने के लिये दो महीने के भीतर दिशा निर्देश तैयार किये जायें.

न्यायमूर्ति ए के सिकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने कहा, ‘‘विरोध प्रदर्शन के अधिकार और शांतिपूर्ण तरीके से रहने के नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है.’’ पीठ ने केन्द्र सरकार को दिशा निर्देश तैयार करने का निर्देश देते हुये कहा, ‘‘ जंतर मंतर और बोट क्लब (इंडिया गेट के निकट) जैसे स्थानों पर विरोध प्रदर्शन के आयोजन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है.’’

न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन मजदूर किसान शक्ति संगठन तथा अन्य की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया. इन सभी ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पांच अक्तूबर, 2017 के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें पर्यावरण कानूनों का हनन होने के आधार पर इन स्थानों पर हर तरह के विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

हरित अधिकरण ने कहा था कि शासन जंतर मंतर रोड क्षेत्र में नागरिकों के प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार की रक्षा करने में बुरी तरह विफल रहा है. अधिकरण ने प्राधिकारियों को धरना प्रदर्शन के लिये वैकल्पिक स्थल के रूप में तत्काल अजमेरी गेट के निकट रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था. इस मामले में सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इससे पहले टिप्पणी की थी, ‘‘जब चुनाव के दौरान राजनीतिक लोग वोट मांगने के लिये जनता के बीच जा सकते हैं तो चुनाव के बाद जनता विरोध प्रदर्शन के लिये उनके कार्यालयों के पास क्यों नहीं आ सकती.