नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के उपराज्यपाल को उनके ‘सुपरमैन’ होने के रवैये के लिये गुरुवार को आड़े हाथ लेते हुये कहा कि वह राजधानी में ‘कचरे के पहाड़ों’ को साफ करने के लिये कुछ नहीं कर रहे हैं. न्यायालय ने कहा कि इन कचरों के पहाड़ में से एक की ऊंचाई तो कुतुब मीनार के बराबर हो गयी है. Also Read - सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई रिपोर्ट, देश में 4442 नेता हैं अपराधी, नंबर वन यूपी, दूसरे नंबर पर बिहार

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दिल्ली में हालात को ‘‘निहायत ही विचित्र’’ करार देते हुये शीर्ष अदालत ने गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में ‘कचरों के पहाड़’ का जिक्र किया और कहा कि गाजीपुर में तो 65 मीटर ऊंचा टीला बन चुका है जो कुतुब मीनार से सिर्फ आठ मीटर ही कम है. न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने उपराज्यपाल के रवैये पर सवाल उठाया और कहा कि उनके कार्यालय के किसी भी अधिकारी ने ठोस कचरा प्रबंधन के मसले पर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री की बैठक में शामिल होने की परवाह नहीं की. पीठ ने कहा, ‘‘यहां उपराज्यपाल कार्यालय से किसी ने भी बैठक में शामिल होने की परवाह नहीं की और वह (उपराज्यपाल) कहते हैं कि मेरे पास अधिकार हैं और मैं ‘सुपरमैन’ हूं. पीठ ने टिप्पणी की कि यह और कुछ नहीं बल्कि जिम्मेदारी को दूसरे पर थोपना है. नगर निगम यह कर रही है, अत: यह उनकी ड्यूटी है. क्योंकि मैं (उपराज्यपाल) ताकतवर आदमी हूं, कोई मुझे छू नहीं सकता और मैं करूंगा कुछ नहीं. यह रवैया है.’’ Also Read - Sushant Case: CBI जांच की मंजूरी पर सुशांत के भाई का बयान, बोले- अब उम्मीद है इंसाफ मिलेगा 

एलजी की 25 बैठकों में क्या हुआ

उपराज्यपाल कार्यालय और दिल्ली सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे का जिक्र करते हुये पीठ ने कहा कि दोनों ने ही कहा है कि दिल्ली में ठोस कचरा प्रबंधन का मसला नगर निगमों की जिम्मेदारी है और दिल्ली नगर पालिका कानून के तहत इस बारे में निर्देश देने का अधिकार उपराज्यपाल के पास है. पीठ ने जानना चाहा, ‘‘क्या उपराज्यपाल का कार्यालय जिम्मेदार है? आपके हलफनामे के अनुसार तो जवाब हां है. वे इस मामले में मुख्यमंत्री को नहीं लाते हैं.’’ न्यायालय ने कहा कि कचरा भरने के स्थान काफी ऊंचे हो गये हैं और यह उपराज्यपाल कार्यालय की निष्क्रियता का संकेत देते हैं. यह कार्यालय इन स्थानों से ठोस कचरा हटाने में विफल रहे हैं. पीठ ने यह टिप्पणी भी की कि इस मसले पर उपराज्यपाल द्वारा 25 बैठकें आयोजित करने के बावजूद कुछ नहीं हुआ है और कोई भी अनुमान लगा सकता है कि इन बैठकों में क्या चर्चा हुयी होगी. पीठ ने कहा, ‘‘इन बैठकों के बावजूद दिल्ली में कचरों के पहाड़ हैं.‘‘ पीठ ने कहा कि दिल्ली में ठोस कचरे के प्रबंधन के मामले में अधिक गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है.

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कचरा प्रबंधन की सरकार की नीति आदर्शवादी

पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘गाजीपुर, ओखला और भलस्वा के बारे में क्या है. पिछली बार हमें बताया गया था कि यह (गाजीपुर) कचरे का 62 मीटर ऊंचा पहाड़ है. अब आपका हलफनामा बताता है कि यह 65 मीटर है जो कुतुब मीनार से सिर्फ आठ मीटर ही नीचा है.’’ पीठ ने ठोस कचरा प्रबंधन के बारे में सरकार की नीति को आदर्शवादी बताया और कहा कि इसे लागू करना शायद असंभव हो क्योंकि पूर्वी दिल्ली नगर निगम और उत्तरी दिल्ली नगर निगम के पास अपना ही रोजाना का काम करने के लिये धन नहीं है. इस नीति को उपराज्यपाल कार्यालय ने तैयार किया है.

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16 जुलाई तक हलफनामा देने का निर्देश

न्यायालय ने उपराज्यपाल कार्यालय को 16 जुलाई तक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जिसमे इस स्थिति से निबटने के लिये उठाये जाने वाले कदमों का समयबद्ध कार्यक्रम शामिल हों. दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल ने पीठ को यह भी सूचित किया कि उपराज्यपाल के पास दिल्ली नगर निगम कानून के तहत ठोस कचरे के निष्पादन के लिये संबंधित प्राधिकारों को निर्देश देने का अधिकार है.

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दूसरे शहरों में कचरा प्रबंधन के तरीकों की चर्चा

इस बीच, दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने न्यायालय को सूचित किया कि ओखला में कचरा डालने के स्थल पर कचरे की ऊंचाई पिछले आठ महीनों में करीब 10 मीटर कम हो गयी है और अगले साल मार्च तक इसके सात मीटर और कम हो जाने की संभावना है. इस मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोन्साल्विज ने नागपुर नगर निगम द्वारा ठोस कचरा प्रबंधन के मसले से निबटने के लिये उठाये गये कदमों का जिक्र करते हुये कहा कि गुरुग्राम में भी यही प्रयास किेये जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि नागपुर में ठोस कचरे से निबटने के लिये उठाये गये कदम काफी सफल रहे हैं. उपराज्यपाल कार्यालय और दिल्ली सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पिंकी आनंद ने न्यायालय को इस मामले में उपराज्यपाल द्वारा उठाये गये कदमों की जानकारी दी.