नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को आरओ निर्माताओं के संगठन से कहा कि पानी में टीडीएस की मात्रा 500 एमजी प्रति लीटर से कम होने की स्थिति में आरओ के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश से राहत के लिये उन्हें अधिकरण के पास ही जाना होगा. शीर्ष अदालत आरओ निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली वाटर क्वालिटी इंडिया एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस संगठन ने हरित अधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें सरकार को वाटर प्यूरीफायर्स के इस्तेमाल को नियंत्रित करने और पानी में खनिज की मात्रा खत्म होने के दुष्प्रभावों के बारे में जनता को अवगत कराने का निर्देश दिया गया था.

न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट की पीठ ने कहा कि एसोसिएशन दस दिन के भीतर इस मामले में सारे तथ्यों के साथ संबंधित मंत्रालय से संपर्क कर सकती है और सरकार हरित अधिकरण के निर्देश के अनुरूप कोई अधिसूचना जारी करने से पहले उस पर विचार करेगी. इस मामले में सुनवाई के दौरान एसोसिएशन के वकील ने देश के विभिन्न शहरों में पानी के मानकों के बारे में बीएसआई की हाल की रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि दिल्ली के भूजल में भारी धातु की मौजूदगी के संकेत इस रिपोर्ट में दिये गये हैं.

राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने मई महीने में सरकार को उन स्थानों पर आरओ प्यूरीफायर्स प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया था जहां पानी में टीडीएस की मात्रा प्रति लीटर 500 एमजी से कम है. अधिकरण ने इसके साथ ही जनता को इस संबंध में संवेदनशील बनाने का भी निर्देश दिया था. अधिकरण ने सरकार को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया था कि जिन स्थानों पर आरओ प्यूरीफायर्स की अनुमति दी गयी है वहां 60 फीसदी से अधिक जल संग्रहित करना अनिवार्य किया जाये.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन के अनुसार प्रति लीटर 300 एमजी से कम टीडीएस की मौजूदगी वाले जल को बहुत उत्तम माना जाता है जबकि 900 एमजी प्रति लीटर टीडीएस को निम्न स्तर का और 1200 एमजी प्रति लीटर से ऊपर टीडीएस वाले जल को अस्वीकार्य बताया था. अधिकरण ने यह आदेश उस समिति की रिपोर्ट के अवलोकन के बाद दिया था जिसका उसने गठन किया था और इस संबंध मे पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भी निर्देश दिया था. समिति ने अपनी रिपेार्ट में कहा था कि यदि प्रति लीटर जल में टीडीएस की उपस्थिति 500 एमजी से कम है तो आरओ प्रणाली उपयोगी नहीं होगी और इसकी वजह से महत्वपूर्ण खनिज इससे बाहर निकल जायेंगे और इससे जल की अनावश्यक बर्बादी होगी.