नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि मुस्लिमों में एक बार में तीन बार तलाक बोलकर दिए जाने वाले तलाक की प्रथा ‘अमान्य’, ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है. शीर्ष अदालत ने 3:2 के मत से सुनाए गए फैसले में इस तीन तलाक को कुरान के मूल तत्व के खिलाफ बताया.

पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने अपने 395 पन्नों के आदेश में कहा कि 3-2 के बहुमत के जरिए दर्ज किए गए विभिन्न मतों को देखते हुए ‘तलाक-ए- बिद्दत’ तीन तलाक को दरकिनार किया जाता है. प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर जहां तीन तलाक की प्रथा पर छह माह के लिए रोक लगाकर सरकार को इस संबंध में नया कानून लेकर आने के लिए कहने के पक्ष में थे, वहीं जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आर एफ नरीमन और जस्टिस यू यू ललित ने इस प्रथा को संविधान का उल्लंघन करार दिया.

बहुमत वाले इस फैसले में कहा गया कि तीन तलाक समेत हर वो प्रथा अस्वीकार्य है, जो कुरान के मूल तत्व के खिलाफ है. तीन न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि तीन तलाक के जरिए तलाक देने की प्रथा स्पष्ट तौर पर स्वेच्छाचारी है. यह संविधान का उल्लंघन है और इसे हटाया जाना चाहिए. प्रधान न्यायाधीश खेहर और जस्टिस नजीर के अल्पमत वाले फैसले में तीन तलाक की प्रथा पर छह माह की रोक की बात की गई. इसके साथ ही राजनीतिक दलों से कहा गया कि वे अपने मतभेदों को दरकिनार करके एक कानून लाने में केंद्र की मदद करें.

अल्पमत के फैसले के न्यायाधीशों ने कहा कि अगर केंद्र छह माह के भीतर कानून लेकर नहीं आता तो तीन तलाक पर उसका आदेश जारी रहेगा. प्रधान न्यायाधीश और जस्टिस नजीर ने अपने अल्पमत वाले फैसले में यह उम्मीद जताई कि केंद्र का कानून मुस्लिम संगठनों और शरिया कानून से जुड़ी चिंताओं को ध्यान में रखेगा.

पीठ में मौजूद जज अलग-अलग धर्मों के थे. इनमें सिख, ईसाई, पारसी, हिंदू और मुस्लिम धर्म के जज थे. पीठ ने कुल सात याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें मुस्लिम महिलाओं द्वारा समुदाय में व्याप्त ‘तीन तलाक’की प्रथा को चुनौती देने वाली पांच अलग याचिकाएं भी शामिल थीं. याचिककर्ताओं ने दावा किया था कि ‘तीन तलाक’ की प्रथा असंवैधानिक है.

याचिकाएं दायर करने वाली मुस्लिम महिलाओं ने ‘तीन तलाक’ की उस प्रथा को चुनौती दी थी, जिसके तहत पति तलाक देने के लिए एक बार में तीन बार ‘तलाक’ बोल देता है. कई बार वह फोन पर या मोबाइल संदेश में ही तलाक बोल देता है. सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि मुस्लिमों में शादी को तोड़ने के लिए ‘तीन तलाक’ की प्रथा ‘सबसे बुरी’ है और यह ‘‘वांछित तरीका’’ नहीं है. हालांकि कुछ ऐसे पक्ष भी हैं, जो इसे ‘वैध’ बताते हैं.

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इससे पहले केंद्र ने पीठ को बताया था कि अगर ‘तीन तलाक’को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अमान्य और असंवैधानिक ठहराया जाता है तो वह मुस्लिमों में शादी और तलाक का नियमन करने के लिए एक कानून लेकर आएगा. सरकार ने मुस्लिम समुदाय में तलाक की तीनों किस्मों- तलाक-ए-बिद्दत, तलाक हसन और तलाक अहसन को ‘एकपक्षीय’ और ‘न्यायेतर’ बताया था.

सरकार ने कहा था कि हर पर्सनल लॉ को संविधान के अनुरूप होना चाहिए और विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकारों को एक ही श्रेणी में रखना चाहिए और ये संविधान के अनुरूप होने चाहिए. केंद्र ने कहा था कि ‘तीन तलाक’ न तो इस्लाम का मौलिक हिस्सा है और न ही यह ‘बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक’ का मुद्दा है. यह मुस्लिम पुरूषों और वंचित महिलाओं के बीच ‘‘अंतरसमुदायिक संघर्ष’’ है.

याचिकाओं में ‘निकाह हलाला’ और मुस्लिमों में बहुविवाह को भी चुनौती दी गई.  पीठ ने खुद मुख्य मुद्दा उठाया। उस याचिका पर लिखा था, ‘‘मुस्लिम महिलाओं की समानता की तलाश’’. सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का स्वत: संज्ञान लिया कि क्या तलाक की स्थिति में या अपने पतियों की अन्य शादियों के चलते मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है?