बंगाल में 'गुंडाराज' पर लगेगा ब्रेक! बिना ट्रायल एक साल की होगी जेल, प्रॉपर्टी भी जब्त करेगी सरकार, जानें क्या है पब्लिक सेफ्टी बिल

Written By: Anjali Karmakar Updated by: Anjali Karmakar
Updated Date:June 29, 2026 9:50 PM IST

पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए एक नया और सख्त कानून लाने की तैयारी कर ली है. 'वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026' को विधानसभा में सोमवार को पेश किया गया.

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पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सोमवार (29 जून 2026) को 'द वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल 2026' (पब्लिक सेफ्टी बिल) को भारी बहुमत से पास कर दिया. इस बिल के पक्ष में 176 वोट पड़े. 41 विधायकों ने इसका विरोध किया. अब बिल को कानून व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, लेकिन इस बिल में ऐसी कई बातें हैं; जिन्हें लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है.

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आइए जानते हैं क्या है ये बिल? बंगाल की सुवेंदु सरकार को ये बिल लाने की क्यों पड़ी जरूरत? इस बिल में किन प्रावधानों को लेकर बवाल मचा हुआ है:-

क्या है पब्लिक सेफ्टी बिल?

पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए एक नया और सख्त कानून लाने की तैयारी कर ली है. 'वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026' को विधानसभा में सोमवार को पेश किया गया. इस प्रस्तावित बिल के तहत सरकार को अपराधियों के खिलाफ पहले से कहीं ज्यादा व्यापक अधिकार मिलेंगे. इनमें प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत), किसी इलाके से बाहर करने (Externment), अपराध से जुड़ी संपत्ति जब्त करने और पुलिस को अतिरिक्त शक्तियां देने जैसे प्रावधान शामिल हैं.

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क्यों लाया गया ये बिल?

कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा में कहा था कि राज्य सरकार अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए नया कानून लाएगी. उन्होंने कहा था कि गंभीर अपराधों में शामिल लोगों को आसानी से जमानत नहीं मिलेगी. अपराध से अर्जित संपत्ति को जब्त कर उसकी नीलामी भी की जा सकेगी. अब प्रस्तावित विधेयक में इन्हीं घोषणाओं को कानूनी रूप देने की तैयारी दिखाई दे रही है.

क्या है बिल का उद्देश्य?

न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, सुवेंदु सरकार के मुताबिक, इस बिल का मुख्य उद्देश्य राज्य में सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखना, कानून-व्यवस्था मजबूत करना और संगठित असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगाना है.

बिल की खास बातें?

पब्लिक सेफ्टी बिल में 'असामाजिक गतिविधियों' की परिभाषा भी काफी व्यापक रखी गई है. इसके तहत ऐसे काम शामिल होंगे जो लोगों में डर पैदा करें. जान-माल के लिए खतरा बनें, सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ें, अवैध कब्जा करें, सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाएं या अवैध खनन, वन और वन्यजीवों से जुड़े अपराधों के जरिए सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाएं.

किसे माना जाएगा 'गुंडा'?

प्रस्तावित बिल के मुताबिक, बंगाल में ऐसा व्यक्ति जो आदतन असामाजिक गतिविधियों में शामिल रहता हो या उन्हें बढ़ावा देता हो, किसी आपराधिक गिरोह या सिंडिकेट का सदस्य या सरगना हो, या फिर भारतीय न्याय संहिता (BNS), आर्म्स एक्ट, NDPS एक्ट, इमोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट या एक्सप्लोसिव सब्स्टेंस एक्ट के तहत चार्जशीट का सामना कर चुका हो, उसे 'गुंडा' की कैटेगरी में रखा जा सकता है.

बिना ट्रायल 12 महीने की हिरासत

बिल का सबसे अहम प्रावधान प्रिवेंटिव डिटेंशन है. इसके तहत अगर सरकार को सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (SP) या सीनियर पुलिस अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर लगता है कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा है, तो उसे एहतियातन हिरासत में लिया जा सकता है. इसके लिए किसी वॉरन्ट की जरूरत नहीं पड़ेगी. ये केस नॉन-बेलेवल होगा. यानी हिरासत में लिए गए शख्स को जल्दी जमानत भी नहीं मिल पाएगी.

बिल के मुताबिक, सामान्य तौर पर प्रिवेंटिव डिटेंशन के लिए संबंधित व्यक्ति का पिछले 7 साल में कम-से-कम एक बार दोषी ठहराया जाना या 3 अलग-अलग मामलों में चार्जशीट दाखिल होना जरूरी होगा. हालांकि, अगर सरकार को लगे कि स्थिति बेहद गंभीर है, तो वह इन शर्तों में भी छूट दे सकती है.

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15 दिनों के भीतर सरकार से लेनी होगी मंजूरी

इमरजेंसी के केस में जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस कमिश्नर भी हिरासत का आदेश जारी कर सकेंगे. हालांकि, ऐसे आदेश को 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार की मंजूरी लेनी होगी. इसके बाद हाईकोर्ट के मौजूदा या पूर्व जज के नेतृत्व में बनाया गया सलाहकार बोर्ड इस मामले की समीक्षा करेगा. समीक्षा के बाद हिरासत की अवधि मैक्सिमम 12 महीने तक हो सकती है. इसके बाद ट्रायल शुरू करना पड़ेगा.

संपत्ति जब्त करने की शक्ति

प्रस्तावित बिल के तहत प्रशासन किसी व्यक्ति को एक साल तक किसी विशेष क्षेत्र से बाहर रहने यानी तड़ीपाड़ का आदेश भी दे सकता है.तड़ीपाड़ (Externment) एक कानूनी कार्रवाई है, जिसमें किसी व्यक्ति को किसी खास शहर, जिले या इलाके से निश्चित समय के लिए बाहर रहने का आदेश दिया जाता है.

आवाजाही पर भी रखी जाएगी निगरानी

इसके अलावा अधिकारियों को यह अधिकार होगा कि वे आरोपी की आवाजाही पर निगरानी रखें, उसे समय-समय पर पुलिस के सामने हाजिर होने का निर्देश दें और असामाजिक गतिविधियों से जुड़ी आशंका होने पर नकदी, दस्तावेज और संपत्ति की तलाशी लेकर उन्हें जब्त कर सकें. अगर कोई व्यक्ति इन आदेशों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ दर्ज मामला संज्ञेय और गैर-जमानती होगा.

अधिकारियों को कानूनी संरक्षण

बिल में यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कोई सरकारी अधिकारी इस कानून के तहत सद्भावना में कार्रवाई करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकेगी.

हिरासत में लिए गए व्यक्ति को क्या अधिकार मिलेंगे?

हिरासत में लिए गए व्यक्ति को निर्धारित समय के भीतर गिरफ्तारी के कारण बताए जाएंगे. उसे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा. बिल में कहा गया है कि अगर कोई आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो जाता है, तो उसकी संपत्ति जब्त की जाएगी. लेकिन, अगर सरकार को लगे कि किसी जानकारी का खुलासा सार्वजनिक हित के खिलाफ है, तो वह उसे साझा नहीं करेगी.

पुराना कानून भी होगा अपडेट

सरकार विधानसभा में वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर (संशोधन) बिल, 2026 भी पेश कर सकती है. इसका उद्देश्य कांग्रेस शासनकाल के दौरान बने पुराने कानून को मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप अपडेट करना है.

विपक्ष क्या कह रहा है?

सरकार का दावा है कि यह कानून संगठित अपराध और असामाजिक तत्वों पर सख्ती के लिए जरूरी है, लेकिन विपक्ष और नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठन इस तरह के कानूनों में प्रिवेंटिव डिटेंशन, व्यापक पुलिस शक्तियों और संपत्ति जब्ती जैसे प्रावधानों के संभावित दुरुपयोग का मुद्दा मानते हैं.

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