कैरान लोकसभा उपचुनाव में आरएलडी की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बड़ी जीत दर्ज की है. साल 2019 के ट्रॉयल के रूप में देखे जा रहे इस चुनाव में बीजेपी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है. सपा, बसपा, कांग्रेस और आरएलडी गठबंधन की प्रत्याशी ने पूरे समीकरण को धता बताते हुए 40 हजार से ज्यादा मतों से जीत दर्ज की है. आइए जानते हैं तबस्सुम की जीत के क्या कारण रहे… Also Read - कांग्रेस ने कहा- एक साल में केंद्र ने देश को निराशा और पीड़ा दी, 'बेबस लोग, बेरहम’ सरकार’ का नारा भी दिया

फैमिली बैकग्राउंड
1. तबस्सुम हसन एक बड़े राजनैतिक परिवार से ताल्लुख रखती हैं. वह साल 2009 में खुद सांसद रह चुकी हैं. उनके पति मुनव्वर हसन साल 1996 में वहां से सांसद रह चुके हैं. इतना ही नहीं उनके ससुर अख्तर हसन 1984 में कांग्रेस से सांसद थे. तबस्सुम के बेटे नाहिद हसन कैरान विधानसभा से सपा विधायक हैं. ऐसे में स्पष्ट तौर पर दिखता है कि तबस्सुम के परिवार का दखल कैराना से लेकर मुजफ्फरपुर तक है. Also Read - स्मृति ईरानी ने कहा- कांग्रेस देश की चुनौतियों से फायदा उठाने की कोशिश में है, वो यही कर सकती है

जाति समीकरण
2. कैराना चुनाव से पहले सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद समझौता करने पर तैयार रहे. इस गठबंधन ने बिना किसी बड़ी शर्त के तबस्सुम को लड़ाया और ऐसा समीकरण तैयार किया जिसने तबस्सुम की जीत में बड़ी भूमिका निभाई. कैराना के 17 लाख वोटर्स में 5 लाख मुस्लिम, 4 लाख ओबीसी जिसमें जाट, गुर्जर, कश्यप, प्रजापति और अन्य हैं और लगभग 1.5 लाख जाटव वोट हैं. ऐसे में गठबंधन सभी को साधने में कामयाब रहा. Also Read - कांग्रेस का दावा- 'स्पीक अप इंडिया' सबसे बड़ा डिजिटल आंदोलन, 57 लाख लोग LIVE आए, 10 करोड़ लोगों ने देखे VIDEO

नेताओं ने छोड़ी रंजिश
3. चुनाव से पहले सबसे बड़ी मुसीबत थी कि गठबंधन के सभी नेता एक दूसरे को सपोर्ट करें. कांग्रेस के यूपी उपाध्यक्ष इमरान मसूद और सपा विधायक नाहिद हसन में काफी पुराना टकराव था. बड़ी दिक्कत ये थी कि दोनों एक मंच पर कैसे आएंगे. लेकिन प्रत्याशी की घोषणा के साथ ही इमरान और नाहिद में समझौता हो गया और दोनों ने एक साथ मंच साझा किया. इससे उनके समर्थक भी तबस्सुम के लिए काम करने लगे. इसका असर रिजल्ट पर पूरी तरह से पड़ा.

देवर का समर्थन
4. तबस्सुम के लिए सबसे बड़ी दिक्कत उनके देवर साबित हो रहे थे. उनके देवर कंवर हसन लोक दल से चुनावी मैदान में थे. ऐसे में एक परिवार से दो लोगों के खड़ा होने से वोटों के बंटवारे का अंदेशा था. लेकिन माना जा रहा है कि राष्ट्रीय लोक दल के जयंत चौधरी और कांग्रेस के इमरान मसूद के प्रयास से कंवर ने चुनाव से हटने का फैसला ले लिया और अपनी भाभी को समर्थन दे दिया. बताया जा रहा है कि इससे परिवार और परिवार के संपर्कों का सीधा लाभ तबस्सुम को मिला.

मृगांका को बेटे ने हराया था
5. मृगांका सिंह कभी भी मजबूत उम्मीदवार के रूप में नहीं दिखीं. उनके पिता हुकुम सिंह जब कैराना विधानसभा छोड़ा लोकसभा में चले गए तो यहां हुए उपचुनाव में तबस्सुम के बेटे नाहिद हसन ने जीत दर्ज की. जबकि यहां साल 1996 से बीजेपी जीतती आ रही है. 2017 चुनाव में इस सीट पर बीजेपी से मृगांका लड़ी थीं और नाहिद हसन ने एक बार फिर जीत दर्ज की. ऐसे में विधानसभा हारी प्रत्याशी को लोकसभा लड़ा कर बीजेपी ने गलती कर दी.

दलितों का फैक्टर
6. सहारनपुर हिंसा के बाद दलितों के बीच मजबूत पकड़ बना चुकी भीम आर्मी ने तबस्सुम हसन को समर्थन देने का ऐलान कर दिया था. बताया जा रहा है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के दलितों के बीच भीम आर्मी का अच्छा प्रभाव है. ऐसे में भीम आर्मी को समर्थन करने वाला वोट भी तबस्सुम के साथ आ गया.

अखिलेश यादव की रणनीति
7. चुनाव से पहले गठबंधन ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को स्टार प्रचार बनाया था. लेकिन अखिलेश यादव ने वहां किसी तरह की रैली या रोड शो नहीं किया. इसके लिए रणनीति बनाई गई की रोड शो होने से वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है. चुनाव नतीजे देखते हुए यह रणनीति सही ही साबित हुई.

घर-घर प्रचार
8. सपा, कांग्रेस, बसपा और रालोद के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर प्रचार किया. उनकी रणनीति ये थी कि वे जनता से सीधे बात करें और उन्हें अपने पक्ष में लाने की कोशिश करें. चुनावी नतीजे देख लगता है कि कार्यकर्ता इसमें कामयाब रहें.